देव-डी में कल्कि केकला

लोग | जन्मदिन

कल्कि केकलां की पहली फिल्म ‘देव-डी’ से जुड़ी पांच बातें

कल्कि केकलां ने साल 2009 में रिलीज हुई फिल्म 'देव-डी' से डेब्यू किया था जिसके निर्देशक अनुराग कश्यप थे

ब्यूरो | 10 जनवरी 2019

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पहली फिल्म कैसे मिली?

कुछ साल पहले एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कल्कि केकलां ने बताया था कि उनका पोर्टफोलियो देखकर ‘देव डी’ के निर्देशक अनुराग कश्यप ने उन्हें फिल्म में लेने से इंकार कर दिया था. अनुराग का कहना था कि उनके विदेशी नैन-नक्श उन्हें चंदा के उस घोर भारतीय किरदार के लिए अनफिट बनाते हैं जो शरतचंद्र चटर्जी की चंद्रमुखी से प्रेरित है. बाद में उनके ऑडिशन के फुटेज देखने के बाद उन्होंने न सिर्फ कल्कि को फिल्म में लिया बल्कि पटकथा में उनके हिसाब से कुछ जरूरी बदलाव भी करवाए.

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किरदार क्या था?

‘देव डी’ के करीब 40 मिनट गुजरने के बाद चंदा यानी कल्कि केकलां स्कूल यूनिफॉर्म में परदे पर नज़र आती हैं. यहां पर कल्कि अपने स्टूडेंट लुक से ज्यादा अपने चेहरे की मासूमियत और निश्छल मुस्कुराहट से इस बात का पक्का यकीन दिला देती हैं कि असल में वे सोलह बरस की ही हैं. बाद में उनका रोल एक कॉलेज गोइंग गर्ल कम सेक्स वर्कर में बदल जाता है जिसे वे बेहद शिद्दत से निभाती भी हैं.

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देखने वालों ने सोचा!

पहली फिल्म के बाद कल्कि केकलां के बारे में ज्यादातर फिल्म समीक्षकों की राय यही थी कि वे फिल्म किरदार की जरूरत के हिसाब से काफी सेंशुअस नज़र आईं. ठीक उसी वक्त उन्होंने अपने अभिनय से मॉडर्न चंद्रमुखी को भी बखूबी जिया है. उस वक्त देखने वालों का अंदाजा उनके वन फिल्म वंडर होने या कुछ एंग्लो-इंडियन भूमिकाएं करने से आगे शायद ही गया होगा!

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अब ख्याल आता है…

आज ‘देव डी’ को देखते हुए आपको शिद्दत से एहसास होता है कि कल्कि केकलां ने अपनी पहली फिल्म का हर शॉट परफेक्शन के साथ दिया था. उनका यही परफेक्शन उनके किरदार की चर्चा होते रहने की वजह बना. आज इस फिल्म को देखो तो थिएटर करके आई इस अभिनेत्री के चेहरे पर मासूमियत के साथ-साथ एक समझदारी की झलक भी मिलती है जो बाद में उन्हें ‘वेटिंग’ और ‘शंघाई’ जैसी इंटेंस फिल्मों के काबिल साबित करती है.

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ईनाम-ओ-इकराम

‘देव डी’ के लिए कल्कि ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का आइफा, फिल्मफेयर और प्रोड्यूसर गिल्ड पुरस्कार जीता था. इस फिल्म को रिलीज हुए अब लगभग एक दशक बीत चुका है और कल्कि राष्ट्रीय पुरस्कार सहित जाने कितने देसी-विदेशी अवार्ड अपनी झोली में समेट चुकी हैं. लेकिन फिर भी शायद उनके और उनके अभिनय के प्रति सबसे बड़ा सम्मान भारतीय दर्शकों द्वारा उन्हें स्वीकार कर लिया जाना ही होगा. अगर ऐसा नहीं होता तो शायद ही कोई सोच पाता कि ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी घोर मसाला फिल्मों में उनके लिए भी गुंजाइश बन सकती है.

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