संगीतकार खय्याम

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खय्याम: जिनके संगीत में सुकून को ठिकाना मिलता था

बहुत ज्यादा फिल्में ना करने वाले खय्याम ने जितना भी संगीत रचा वह हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में मील का पत्थर साबित हुआ

ब्यूरो | 20 अगस्त 2019

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खय्याम के संगीत को अगर एक शब्द में समेटना हो तो वह होगा सुकून. यह उनके संगीत में छिपा सुकून ही है कि आप उनका कोई गाना सुन रहे हों या गुनगुना रहे हों, अपने आप ही आंखें बंद कर लेने का मन होता है. खय्याम की रचनाओं के बारे में कहा जाता है कि वे गायक और श्रोता, दोनों को ही एक अलग ही स्तर पर ले जाती हैं.

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खय्याम का पूरा नाम मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी था. उनका जन्म अविभाजित पंजाब में हुआ था. घर में कविता और संगीत का माहौल था. इस कारण किसी ने भी उनके संगीत सीखने पर एतराज नहीं किया. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान खय्याम दो साल तक फौज में सिपाही रहे. फिर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बंबई आ गए. यहां उन्हें 1948 में पहली बार हीर-रांझा फिल्म में संगीत देने का मौका मिला. इसके लिए रहमान वर्मा नाम के एक दूसरे संगीतकार के साथ उन्होंने जोड़ी बनाई थी. शर्माजी-वर्माजी नाम की इस जोड़ी ने कई फिल्मों में संगीत दिया.

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1953 में आई फिल्म फुटपाथ में उन्हें पहली बार अकेले काम करने का मौका मिला. फिल्म निर्देशक जिया सरहदी की सलाह पर इस फिल्म में उन्होंने पहली बार खय्याम नाम से संगीत दिया. इसके बाद उन्होंने कुछ और फिल्में भी कीं, लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मिली 1958 में आई राजकपूर की फिल्म, ‘फिर सुबह होगी’ से.

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दो बार ऐसे दौर भी आए जब खय्याम मुख्यधारा से दूर हो गए थे, लेकिन दोनों ही बार उन्होंने धमाकेदार वापसी की. पहली बार ऐसा 1976 में हुआ जब यश चोपड़ा की फिल्म ‘कभी-कभी’ ने उन्हें फिर चर्चा का विषय बना दिया. दूसरी बार ऐसा 1982 में हुआ जब मुजफ्फर अली की फिल्म उमराव जान के संगीत की धूम मची.

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कुछ साल पहले खय्याम ने अपनी सारी संपत्ति दान करने की घोषणा की थी. करीब 12 करोड़ की इस संपत्ति से उन्होंने फिल्म जगत के जरूरतमंद और उभरते संगीतकारों के लिए एक ट्रस्ट बनाने का फैसला किया था. खय्याम का कहना था कि देश ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और अब वे देश को कुछ लौटाना चाहते हैं.

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