मायावती

लोग और इतिहास | जन्मदिन

मायावती की सियासी यात्रा के पांच सबसे अहम मोड़ कौन से हैं?

विपक्षी महागठबंधन के मद्देनजर मायावती के जन्मदिन यानी 15 जनवरी पर सियासी जानकारों और रणनीतिकारों की निगाहें लगी हैं.

ब्यूरो | 22 दिसंबर 2018 | फोटो: ट्विटर/बीएसपी

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कॉन्स्टिट्यूशन क्लब का भाषण

1977 में दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में उन दिनों केंद्र में सत्ताधारी जनता पार्टी का एक आयोजन था. इसके मुख्य वक्ताओं में चुनाव में इंदिरा गांधी को हराने वाले राजनारायण भी थे. अपने भाषण में उन्होंने दलितों को बार-बार ‘हरिजन’ कहकर संबोधित किया. श्रोताओं में बैठी मायावती को यह ठीक नहीं लगा. जब उनको बोलने का मौका मिला तो उन्होंने कहा कि हरिजन शब्द का इस्तेमाल करके सभी नेता दलितों को अपमानित करते हैं. मायावती का कहना था कि भीमराव अंबेडकर ने संविधान में दलितों के लिए हरिजन शब्द का नहीं बल्कि अनुसूचित जाति का इस्तेमाल किया है. उनके आक्रामक और तर्कपूर्ण भाषण का नतीजा यह हुआ कि कार्यक्रम में ही राजनारायण के खिलाफ नारे लगने लगे. इसी के बाद मायावती, बसपा संस्थापक कांशीराम की नजर में आईं.

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पिता का घर छोड़ना

सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपनी बेटी की बढ़ती सक्रियता से प्रभु दास खिन्न रहते थे. उनके लाख समझाने के बावजूद मायावती प्रशासनिक सेवा की तैयारी में वक्त नहीं दे पा रही थीं. उन्हें लगता था कि कांशीराम ने ही उनकी बेटी को रास्ते से भटका दिया है. एक दिन उन्होंने मायावती के लिए फरमान जारी कर दिया कि अगर घर में रहना है तो कांशीराम से मिलना-जुलना बंद करना होगा नहीं. इसके बाद मायावती ने पिता का घर छोड़ दिया और कांशीराम के साथ रहने लगीं.

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डीएस-4

डीएस-4 का मतलब है दलित शोषित समाज संघर्ष समिति. इस मंच की घोषणा कांशीराम ने 1981 में की थी. इसका मुख्य नारा था: ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-4. यह एक राजनीतिक मंच नहीं था लेकिन इसके जरिए कांशीराम ने न सिर्फ दलितों की बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच भी एक तरह की गोलबंदी करना चाह रहे थे. डीएस-4 के तहत कांशीराम ने सघन जनसंपर्क अभियान चलाया जिसमें मायावती ने उनका बढ़-चढ़कर साथ दिया. डीएस-4 की सामाजिक पूंजी से उत्साहित होकर कांशीराम ने 14 अप्रैल, 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की. भले ही बसपा की स्थापना को उस वक्त मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी हो लेकिन उसी वक्त यह साफ हो गया था कि इस संगठन के शीर्ष पर कांशीराम और मायावती ही हैं.

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गेस्ट हाउस कांड

एक जून, 1995 को मायावती ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोती लाल वोरा से मुलाकात कर उन्हें सपा की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी की जानकारी दी. उन्होंने नई सरकार के गठन के लिए दावा भी पेश किया. इसके बाद दो जून को मायावती ने अपनी पार्टी के विधायकों की बैठक लखनऊ के राज्य अतिथिगृह में बुलाई. लेकिन कुछ ही देर बाद अचानक 200 से ज्यादा लोगों की भीड़ ने गेस्ट हाउस पर हमला बोल दिया. बाद में मालूम चला कि इस भीड़ में न सिर्फ सपा कार्यकर्ता शामिल थे बल्कि पार्टी के कई विधायक भी थे. यह भीड़ मायावती के कमरे का दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने लगी. बाद में जिलाधिकारी के हस्तक्षेप से भीड़ को हटाया जा सका.इस घटना ने मायावती को अंदर तक हिला दिया. असुरक्षा की जिस चादर में आज भी मायावती लिपटी दिखती हैं, जानकार मानते हैं कि उसके लिए अगर सबसे अधिक कोई घटना जिम्मेदार है तो वह है गेस्ट हाउस कांड.

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मुख्यमंत्री मायावती

वैसे तो सत्ता का स्वाद मायावती ने उसी दौर में बगैर मंत्री बने चखना शुरू कर दिया था जब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की गठबंधन सरकार बनी. इस सरकार में मायावती मंत्री नहीं थीं लेकिन उन्हें कांशीराम ने बसपा की ओर से सरकार के साथ समन्वय की जिम्मेदारी दी थी. मतलब सरकार जिस पार्टी के समर्थन से चल रही थी, उसकी सबसे ताकतवर नेता के तौर पर मायावती स्थापित हो गईं थीं. लेकिन मायावती जब तीन जून, 1995 को पहली बार देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री बनीं तो यहां से उनकी राजनीति ने एक नया मोड़ लिया. इसके बाद मायावती ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा.

(सत्याग्रह की इस रिपोर्ट पर आधारित)

  • मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा

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