गोपाल कृष्ण गोखले

लोग और इतिहास | पुण्यतिथि

पांच खासियतें जो बताती हैं गोपाल कृष्ण गोखले नरम दल के सबसे प्रभावी विचारों वाले नेता थे

ब्रिटश सरकार के पक्षधर बताए जाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले नरम दल के नेता थे तो इसलिए कि वे विरोधियों को हराने में नहीं उन्हें जीतने में विश्वास करते थे

ब्यूरो | 19 फरवरी 2019 | फोटो: विकीमीडिया

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प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य और निशुल्क हो

गोपाल कृष्ण गोखले ने 1903 में अपने एक बजट-भाषण में कहा था कि भावी भारत दरिद्रता और असंतोष का भारत नहीं होगा बल्कि उद्योगों, जाग्रत शक्तियों और संपन्नता का भारत होगा. वे पाश्चात्य शिक्षा को भारत के लिए वरदान मानते थे और इसका अधिकाधिक विस्तार चाहते थे जिससे भारतीय पुराने, जीर्ण-शीर्ण विचारों से मुक्त हो सकें. उन्होंने अंग्रेजी सरकार को ये विचार दिया कि प्राथमिक शिक्षा को छह से दस वर्षो तक के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और इसके खर्चे को सरकार और संस्थाएं उठाएं. लेकिन सरकार इस बात के लिए राज़ी नहीं थी.

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नौकरशाही के केंद्रीकरण पर प्रहार

गोखले ने नौकरशाही के हाथों में शक्ति के केंद्रीकरण की बुराइयों को उजागर किया और देश के प्रति शोषणवादी अर्थनीति की भी तार्किक आलोचना की. 1905 में लंदन के ‘न्यू रिफार्म क्लब’ में दिए भाषण में उन्होंने कहा कि नौकरशाही के तीन मुख्य दोष हैं – केंद्रीकरण, भारतीय शिक्षित वर्ग को सत्ता से बाहर रखना और हर मसले पर अपनी सत्ता के हितों का ख्याल रखना.

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सरकारी मशीनरी को हल्का करने पर ज़ोर

गोखले ने सरकार पर इस बात के लिए दवाब डाला कि वह लोक-कल्याणकारी हो और इससे संबंधित कार्यक्रमों पर अधिक खर्च करे, अपने मुलाज़िमों की संख्या घटाए, सैनिक व्यय कम करे और प्रशासनिक सुधार पर ज़ोर लगाये. उन्हें शिकायत थी कि सरकार सफाई जैसे ज़रूरी कामों पर ध्यान नहीं लगाती. बाद में उन्हीं के प्रयासों से नमक पर लगने वाला टैक्स ढाई रुपये प्रति मन से आठ आने प्रति मन कर दिया गया था. इसके अलावा वे सत्ता के विकेंद्रीकरण, शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने के भी पक्षधर थे.

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हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक

वे हिंदू–मुस्लिम एकता को भारत के लिए कल्याणकारी मानते थे. उनका कहना था कि बहुसंख्यक होने और शिक्षा की दृष्टि से उन्नत होने के कारण हिंदुओं का कर्तव्य है कि सामान्य राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने में अपने मुस्लिम भाइयों के सहायक बने. जिन्ना को वे हिंदू- मुस्लिम भाईचारे का सबसे बड़ा पैरोकार मानते थे. गांधी के साथ-साथ वे जिन्ना के भी राजनैतिक गुरु थे. गोखले एक ऐसे राजनैतिक विचारक थे जो राजनीति में अध्यात्मिक अवधारणा लेकर आये थे.

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गांधी का स्वदेश आन्दोलन इनकी ही देन था

गोखले पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वदेशी’ विचार पर ज़ोर दिया. राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति और इतिहासकार प्रोफेसर केएल कमल के अनुसार – ‘उन्होंने स्वदेशी को प्रोत्साहन देते हुए बताया कि यह देशभक्ति के साथ-साथ एक आर्थिक आंदोलन भी है.’ प्रोफेसर कमल उन्हें उदारवादियों का सिरमौर और भारत के संवैधानिक विकास का जनक मानते हैं. वे कहते हैं कि उन्होंने कोई नया सिद्धांत नहीं दिया बल्कि भारतीय परिवेश में पाश्चात्य राजनैतिक परंपरा के विलय की बात कही थी.

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