वाट्सएप

विचार-रिपोर्ट | तकनीक

क्यों हमें वाट्सएप की मनमानी रोकने के लिए यूरोप से सबक लेने की जरूरत है

सोशल मीडिया साइट्स जिस तरह की मनमानी भारत में कर सकती हैं, वैसी उनके लिए यूरोप में करना संभव नहीं है

ब्यूरो | 19 जनवरी 2021 | फोटो: पिक्सबे

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क्या हुआ है?

भारत समेत कई देशों के यूजर्स को नए साल के पहले हफ्ते में वाट्सएप की नई यूजर पॉलिसी से जुड़ा एक संदेश मिला. नयी यूजर पॉलिसी में कुछ शर्तें थीं और लिखा था कि अगर आठ फरवरी तक आपने इन्हें स्वीकार नहीं किया तो आगे आप इस मैसेजिंग एप का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. वाट्सएप की इस नई यूजर पॉलिसी में कुछ ऐसी बातें शामिल थीं जो ज्यादा तकनीकी ज्ञान न रखने वाले यूजर को भी चिंता में डाल देने वाली थीं. वाट्सएप का इस्तेमाल करने वाले यूजर पहले ही इसे अपनी बहुत सारी जानकारियां इकट्ठा करने की अनुमति देते रहे हैं. इसे यूजर का मेटा डेटा कहा जाता है और इसमें लोकेशन, आईपी एड्रेस, फोन मॉडल, ऑपरेटिंग सिस्टम, बैटरी लेवल, मोबाइल नेटवर्क और सिग्नल स्ट्रेंथ, भाषा, टाइमज़ोन, मोबाइल का आईएमईआई नंबर जैसी सूचनाएं शामिल हैं. इसके अलावा वाट्सएप यह जानकारी भी रखता है कि आप वाट्सएप का इस्तेमाल किस तरह से (मैसेजिंग या कॉलिंग के लिए) करते हैं, किस तरह के ग्रुप्स में शामिल हैं, आपका वाट्सएप स्टेटस और प्रोफाइल फोटो क्या है और आखिरी बार आप कब ऑनलाइन थे.

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नयी पॉलिसी में क्या है?

वाट्सएप की जो नई यूजर पॉलिसी आयी है, उसके मुताबिक कंपनी अब यूजर का डेटा इकट्ठा करने के साथ-साथ उसे इंस्टाग्राम और इन दोनों की पेरेंट कंपनी फेसबुक के साथ साझा भी करेगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अब वाट्सएप पर आपकी निजी बातचीत सुरक्षित नहीं होगी. वाट्सएप लगातार अपने बयानों में भी यह बात कह रहा है कि नई पॉलिसी लागू होने के बाद भी प्राइवेट चैट एंड टू एंड एनक्रिप्टेड होंगी यानी इसे भेजने और रिसीव करने के बीच में व्हाट्सएप भी इसे नहीं पढ़ सकता है. यहां पर होने वाला बड़ा बदलाव यह है कि व्हाट्सएप पर मौजूद बिजनेस अकाउंट्स और पर्सनल अकाउंट्स के बीच होने वाली चैट्स को अब व्हाट्सएप एक्सेस कर सकता है. इसका मकसद व्हाट्सएप के डेटा का इस्तेमाल कर विज्ञापन हासिल करना और मुनाफा कमाना है. इस डेटा का इस्तेमाल यूजर को फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी थर्ड पार्टी प्लेटफार्म पर विज्ञापन दिखाने के लिए किया जाएगा यानी सीधे तौर पर व्हाट्सएप पर विज्ञापन नहीं दिखाई पड़ेंगे.

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नयी पॉलिसी से क्या खतरा है?

वाट्सएप की नई पॉलिसी पर कई दिग्गजों ने सवाल खड़े किये हैं. अमेरिकी कंपनी टेस्ला के सीईओ एलन मस्क, ट्विटर के सीईओ जैक डॉर्सी से लेकर आनंद महिंद्रा और पेटीएम के प्रमुख विजय शेखर शर्मा तक ने इसे डिजिटल स्पेस पर वाट्सएप के एकाधिकार की कोशिश बताया है. वाट्सएप के संस्थापकों में से एक और अब सिग्नल एप के को-फाउंडर ब्रायन एक्टन तक कह चुके हैं कि ‘वाट्सएप की नई नीतियां बहुत भ्रमित करने वाली हैं.’ इनके मुताबिक कहने में भले ही यह बात छोटी लगती हो कि केवल बिजनेस अकाउंट के साथ होने वाले कम्युनिकेशन का डेटा ही शेयर किया जाएगा. लेकिन इतनी सूचनाएं भी किसी यूजर की डिजिटल प्रोफाइलिंग (गतिविधियों का रिकॉर्ड रखने) करने के लिए काफी हैं जो उसकी सुरक्षा और निजता के लिहाज से सही नहीं है. वह भी तब जब कंपनी के पास हर यूजर का पूरा मेटा डेटा पहले से ही है. इसके अलावा, वाट्सएप की नई पॉलिसी पर भारत में आपत्ति का एक पक्ष यह भी है कि देश के करोड़ों यूजर्स का डेटा एक विदेशी कंपनी के पास होगा. इसे जानकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से भी सही नहीं मान रहे हैं. इसके अलावा व्हाट्सएप के जो लगभग 20 फीसदी यूजर्स भारत में हैं उनमें से ज्यादातर अपने डेटा के इस्तेमाल को लेकर सजग नहीं हैं.

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भारत में डेटा की सुरक्षा का कानून बेहद लचर

भारत में वाट्सएप की इस मनमानी का दोष सरकार की ढीली नीतियों को भी दिया जा रहा है. देश में अब तक लोगों के डेटा की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानून नहीं है. इस मामले में स्थिति कितनी लचर है, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि मौजूदा कानून के मुताबिक किसी यूजर का डेटा गलत इस्तेमाल होने की स्थिति में उसे (आईटी एक्ट 2000, सेक्शन 43ए के तहत) यह साबित करना पड़ता है कि उसकी अनुमति के बगैर और गलत तरीके से उसकी सूचनाओं का इस्तेमाल किया गया है. यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि ज्यादातर मौकों पर ऐसा कर पाना बहुत आसान नहीं होता है. वहीं, देश का नया पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, दिसंबर 2019 से संयुक्त संसदीय कमेटी के पास लंबित पड़ा है. वाट्सएप की नई यूजर पॉलिसी को लेकर हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका भी लगाई गई है. इसमें भी यह कहा गया है कि व्हाट्सएप बगैर सरकार की निगरानी के भारतीय यूजर का डेटा इस्तेमाल करना चाहता है जो कि न सिर्फ निजता के अधिकार का हनन है बल्कि देश की सुरक्षा और व्यापारिक आत्मनिर्भरता के लिए भी खतरा हो सकता है.

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यूरोप से सबक लेने की जरूरत

दुनिया के कई जानकार डेटा सुरक्षा कानून को लेकर भारत सहित कई देशों को यूरोप की राह पर चलते की सलाह देते हैं. वाट्सएप की नई पॉलिसी के लिए दुनिया भर में जहां कंपनी का रवैया ‘लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो’ वाला है, वहीं कई यूरोपीय देशों में इसकी शर्तों को स्वीकार करना ज़रूरी नही है. यूरोप में यह जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन के चलते ही संभव हो पाया है. यह कानून किसी भी कंपनी को सेवा इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी जानकारी के अलावा किसी अन्य तरह का डेटा इकट्ठा करने की अनुमति नहीं देता है. इस कानून में दोषी पाए जाने पर भारी ज़ुर्माने का प्रावधान भी है. फेसबुक, यूरोप में वाट्सएप से जुड़ी भ्रामक जानकारी देने के लिए साल 2017 में 110 मिलियन यूरो (लगभग 900 करोड़ रुपए) का जुर्माना भरकर शायद जरुरी सबक सीख चुका है. यूरोपीय देशों में से एक फ्रांस में भी फेसबुक पर इसके यूजर्स का डेटा दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने के लिए जुर्माना लगाया जा चुका है. इसलिए वाट्सएप यूरोपीय देशों के यूजर्स के साथ किसी तरह की जबरदस्ती करने की हिम्मत नहीं कर रहा है. यूरोप का उदाहरण यह बताने के लिए काफी है कि क्यों तकनीक से जुड़ी फेसबुक जैसी कंपनियों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय हमें एक ठोस डेटा सुरक्षा कानून की सख्त ज़रूरत है.

(सत्याग्रह की इस रिपोर्ट पर आधारित)

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