न्यायपालिका

विचार-रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश

क्यों इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये फैसले उत्तर प्रदेश में एनएसए के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाते हैं

इनमें से ज्यादातर मामले गोवध और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं से जुड़े हैं और इन सभी में आरोपितों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाकर हिरासत में भेज दिया गया था

ब्यूरो | 08 अप्रैल 2021 | फोटो: पिक्साबे

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पिछले तीन साल के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे 120 मामलों पर फैसला दिया है जिनमें आरोपितों को अति कठोर माने जाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में रखा गया था. द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल के मुताबिक इन मामलों में से 61 यानी आधे से ज्यादा ऐसे हैं जो गोवध और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं से जुड़े हैं. इनमें से 50 यानी 80 फीसदी मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने आरोपितों पर एनएसए लगाने का आदेश रद्द कर दिया और उन्हें जमानत पर रिहा करने को कहा.

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उधर, सिर्फ सांप्रदायिक घटनाओं के मामले देखें तो एनएसए के गलत उपयोग का यह आंकड़ा 100 फीसदी हो जाता है. जनवरी 2018 से लेकर दिसंबर 2020 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे 20 मामलों में लगाई गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर सुनवाई की और सभी में एनएसए का आदेश रद्द करते हुए आरोपितों को जमानत पर रिहा करने का फैसला सुनाया. ये सारे ही आरोपित अल्पसंख्यक समुदाय से थे. अदालत ने इन मामलों में एनएसए लगाने के आधार को अपर्याप्त माना. सरकार की खिंचाई करते हुए एक मामले में उसका कहना था कि जो कानून सत्ता को अत्यधिक शक्ति प्रदान करते हैं उन्हें इस्तेमाल करते वक्त बेहद सावधानी बरती जानी चाहिए.

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जनवरी 2018 से दिसंबर 2020 के बीच इलाहबाद हाई कोर्ट ने एनएसए से जुड़े 120 मामलों में से 94 मामलों में इस कानून को लगाने का आदेश निरस्त कर दिया. इनमें से छह मामले ऐसे थे जिनमें हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए जोर देकर कहा कि एनएसए को न्यायोचित ठहराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) का यह सपाट बयान पर्याप्त नहीं है कि जमानत पर छूटने के बाद याचिकाकर्ता फिर से आपराधिक गतिविधि को अंजाम देगा जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होगी. चार मामलों में अदालत ने यह नोट किया कि एनएसए लगाने का आधार ऐसी कई एफआईआर थीं जिनमें या तो आरोपित का नाम नहीं था या फिर कथित अपराध में उसकी कोई स्पष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी. चार अन्य मामलों में अदालत ने कहा कि एनएसए के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्तियों का मामला किसी भी देरी के बगैर सलाहकार बोर्ड के सामने पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन इस एकमात्र संवैधानिक सुरक्षा के उपाय का उल्लंघन हुआ. एनएसए के तहत हिरासत में भेजे गए व्यक्ति की रिपोर्ट सरकार को तीन हफ्ते के भीतर इस बोर्ड के सामने पेश करनी होती है.

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दिलचस्प बात यह है कि कई मामलों में एनएसए का आदेश देने वाले जिला मजिस्ट्रेटों ने अपने आदेश में हूबहू एक जैसी बातें कही हैं. मसलन चार मामलों में कहा गया है कि ‘लोगों में घबराहट और आतंक फैल गया था’; ‘भय और आतंक के वातावरण ने स्थानीय लोगों को अपनी चपेट में ले लिया था.’ तीन अन्य मामलों में दिए गए एनएसए के आदेश में दावा किया गया था कि ‘गांव में भगदड़ मच गई और गांव वालों ने अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिए’; ‘अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने यहां-वहां भागना शुरू कर दिया’; ‘माहौल को सांप्रदायिक तनाव ने जकड़ लिया और सांप्रदायिक सौहार्द पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गया.’

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द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस सिलसिले में सात मार्च को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आरके तिवारी को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी गई थी. इसमें हाई कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए राज्य सरकार की प्रतिक्रिया मांगी गई थी. सरकार से पूछा गया था कि हाई कोर्ट ने एनएसए लगाने के जो आदेश रद्द किए हैं, क्या उनकी कोई समीक्षा हो रही है और क्या इस दिशा में कोई सुधारात्मक कदम उठाया गया है. अखबार की मानें तो अभी तक उनका कोई जवाब नहीं आया है.

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