डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

तमिलनाडु में इतनी खींचतान के बाद भी डीएमके ने कांग्रेस को सिर्फ 25 सीटें ही क्यों दीं?

बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तमिलनाडु की नौ सीटों पर चुनाव लड़ी थी और आठ पर जीती थी. इसके बावजूद विधानसभा चुनाव में वह महज 25 सीटों पर ही चुनाव क्यों लड़ रही है

अभय शर्मा | 10 मार्च 2021 | फोटो : एमके स्टालिन/फेसबुक

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डीएमके-कांग्रेस सीट बंटवारा

तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बीते हफ्ते तारीखों का ऐलान कर दिया गया. राज्य में छह अप्रैल को मतदान कराया जाएगा और दो मई को मतगणना होगी. चुनाव की तारीखें आते ही राज्य की दो प्रमुख पार्टियां – द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) और एआईएडीएमके – ने अपने-अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू कर दी. एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर ज्यादा खींचतान नहीं हुई और भाजपा 20 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हो गयी. लेकिन, डीएमके और कांग्रेस गठबंधन में इसे लेकर जबरदस्त खींचतान देखने को मिली. इस गठबंधन की एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस 40 से ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद लगाए बैठी थी. लेकिन डीएमके उसे 20 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं थी. इसके बाद कांग्रेस ने 30 सीटें मांगनी शुरू कर दीं लेकिन स्टालिन अपनी बात पर अड़े रहे. काफी बातचीत के बाद बीते शुक्रवार को डीएमके प्रमुख कांग्रेस को 24 विधानसभा सीटें और कन्याकुमारी लोकसभा सीट जिस पर उपचुनाव होना है, देने को राजी हो गए. लेकिन कांग्रेस फिर भी 30 सीटों पर ही अड़ी रही. पार्टी से जुड़े कुछ सूत्रों के मुताबिक इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एमके स्टालिन से फोन पर बात की, लेकिन वे फिर भी कांग्रेस को 25 से ज्यादा सीटें देने को राजी नहीं हुए. हालांकि, सोनिया गांधी के फोन से कांग्रेस को एक फायदा जरूर मिला. दोनों पार्टियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक डीएमके प्रमुख ने कांग्रेस अध्यक्ष को भरोसा दिया कि वे विधानसभा चुनाव के बाद अपने कोटे से राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस को दे देंगे.

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डीएमके ने गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों को कितनी सीटें दीं?

सीटों के बंटवारे को लेकर डीएमके की जैसी खींचतान कांग्रेस से हुई, वैसी ही अन्य सहयोगी दलों से भी हुई. गठबंधन में शामिल (दलित) पार्टी वीसीके, एमडीएमके और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) तीनों ही दस-दस सीटों की मांग कर रही थीं. लेकिन डीएमके इन्हें केवल पांच-पांच सीटें देने को ही तैयार थी. कई दौर की बातचीत के बाद इन तीनों को छह-छह सीटें दी गयी हैं. इसके अलावा गठबंधन में शामिल एक अन्य सहयोगी पार्टी सीपीआई(एम) ने 12 सीटों की मांग की थी और उसे भी डीएमके ने छह से ज्यादा सीटें नहीं दीं. डीएमके ने राज्य के मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए दो मुस्लिम पार्टियों – आईयूएमएल और एमएनएमके – से भी हाथ मिलाया है. डीएमके गठबंधन में आईयूएमएल को तीन और एमएनएमके को दो सीटें दी गयी हैं.

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एमके स्टालिन को जीत का पूरा भरोसा क्यों?

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को देखें तो सभी में डीएमके गठबंधन की बड़ी जीत बताई गयी है. एसके स्टालिन सहित डीएमके के सभी नेताओं को भी राज्य की सत्ता में वापसी का पूरा भरोसा है. अगर 2016 में तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के समय की और वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो इनमें एक बड़ा अंतर नजर आता है और यह अंतर डीएमके के पक्ष में सबसे बड़ा चुनावी समीकरण बनाता नजर आ रहा है. बीते चुनाव में डीएमके के सामने सबसे बड़ी बाधा एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जयललिता के चलते ही एआईएडीएमके ने राज्य की 39 में से 37 सीटें जीत कर सभी को चौंका दिया था. इस चुनाव में दो सीटें एनडीए गठबंधन को मिली थीं. यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य के दो प्रमुख दलों डीएमके और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिल सकी थी. इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में जयललिता की पार्टी लगातार दूसरो बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई. जानकारों की मानें तो एआईएडीएमके पूरी तरह जयललिता पर ही निर्भर थी और उनके निधन के बाद अब पार्टी में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसका जनता के बीच में डीएमके प्रमुख स्टालिन जैसा प्रभाव हो. इसके अलावा इस बार डीएमके के पक्ष में चुनावी समीकरण इसलिए भी हैं क्योंकि 2016 के विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु में एक तीसरा गठबंधन भी मैदान में था, जिसे वीसीके, एमडीएमके और तमिल सिनेमा के पूर्व अभिनेता विजयकांत की पार्टी डीएमडीके ने मिलकर बनाया था. माना जाता है कि 2016 में जयललिता सरकार से नाराज काफी लोगों ने डीएमके की जगह इस तीसरे गठबंधन को वोट दिया था. लेकिन इस बार डीएमके को उम्मीद है कि इसका एक बड़ा हिस्सा उसे ही मिलेगा क्योंकि वीसीके और एमडीएमके इस बार उसके गठबंधन में हैं.

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कांग्रेस एक कमजोर कड़ी?

डीएमके के नेता बताते हैं कि स्टालिन को इस बार सत्ता में आने का पूरा भरोसा है और इसलिए वे किसी अन्य पार्टी को ज्यादा सीटें देकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं. तमिलनाडु के कुछ पत्रकारों की मानें तो स्टालिन और डीएमके के अन्य नेता गठबंधन में कांग्रेस को एक कमजोर कड़ी की तरह देखते हैं. इन लोगों के मुताबिक इसकी वजह तमिलनाडु और कई राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन है. 2016 के विधानसभा चुनाव में राज्य की कुल 234 सीटों में से डीएमके ने 178 और कांग्रेस ने 41 पर चुनाव लड़ा था. इनमें से डीएमके को 89 और कांग्रेस को महज आठ सीटें ही मिली थीं. डीएमके के कुछ नेता आज भी 2016 में सत्ता में न पहुंच पाने के लिए कांग्रेस के प्रदर्शन को ही जिम्मेदार मानते हैं. बताते हैं कि बीते साल अक्टूबर में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे देखकर डीएमके के रणनीतिकार कांग्रेस को लेकर और ज्यादा सतर्क हो गए. दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन की हार का ठीकरा भी कांग्रेस पर ही फोड़ा गया था. आरजेडी ने 144 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 75 पर जीत दर्ज की. जबकि कांग्रेस को गठबंधन में 70 सीटें दी गयीं थीं, लेकिन वह महज 19 पर ही जीत हासिल कर पायी थी. नतीजतन महागठबंधन बिहार की सत्ता में आने से केवल 12 सीट दूर रह गया. डीएमके के नेताओं की मानें तो कांग्रेस को ज्यादा सीटें न देने की एक बड़ी वजह यह भी है.

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डीएमके को सरकार बनने के बाद की चिंता है

डीएमके के कुछ नेता यह भी बताते हैं कि गठबंधन के अन्य साथियों को कम सीटें देने के पीछे डीएमके के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की प्रमुख भूमिका है. इन नेताओं के मुताबिक प्रशांत किशोर चाहते हैं कि डीएमके इस विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे और अपने दम पर ही बहुमत भी हासिल कर ले. ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब डीएमके कम से कम 180 सीटों पर खुद ही चुनाव लड़े. पार्टी सूत्रों की मानें तो प्रशांत किशोर और स्टालिन ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें तमिलनाडु की सत्ता में आने के बाद की चिंता सता रही है. इन दोनों को ऐसा लगता है कि अगर डीएमके ने कांग्रेस और अपने अन्य गठबंधन सहयोगियों की दम पर बहुमत हासिल किया तो उसके सर पर सरकार गिरने का खतरा मंडराता रहेगा. क्योंकि उस स्थिति में भाजपा डीएमके गठबंधन में शामिल कांग्रेस या अन्य पार्टियों के विधायकों को तोड़ सकती है. लेकिन, अगर डीएमके अकेले ही बहुमत का आंकड़ा पार लेती है तो भाजपा के लिए ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन होगा. बीते कुछ सालों के दौरान देश के कुछ राज्यों की राजनीति पर नजर डालें तो प्रशांत किशोर और स्टालिन का यह डर बाजिव नजर आता है. गोवा, मणिपुर और कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के विधायक अचानक पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए और कांग्रेस सत्ता से दूर हो गयी. बीते साल राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गिरते-गिरते बची. इसके अलावा इसी साल पुडुचेरी में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं और विधायकों ने पार्टी छोड़ दी और इनमें से कुछ भाजपा में शामिल हो गए. नतीजतन कांग्रेस को राज्य की सत्ता से हाथ धोना पड़ा.

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