संसद भवन

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

क्यों संसद के शीत सत्र को रद्द कर देना ठीक नहीं लगता है

जब चुनावों के लिए आम से लेकर सबसे खास तक की सुरक्षा सुनिश्चित या दरकिनार की जा सकती है तो संसद में देश के लिए कुछ दिन काम करना इतनी बड़ी समस्या क्यों है?

ब्यूरो | 28 दिसंबर 2020 | फोटो: पीआईबी

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साल 2020 में संसद केवल 33 दिन ही चली. पिछले कुछ समय से यह साल में लगभग 70 दिन चलती रही है. कुछ जानकारों को यह भी कम लगता था. लेकिन इस बार कुछ और भी हुआ – केंद्र सरकार ने संसद के शीत सत्र को रद्द कर दिया. हालांकि ऐसा जिस वजह से किया गया वह भी अभूतपूर्व है. दुनिया ने कोविड-19 जैसी महामारी पिछले सौ सालों में नहीं देखी थी. लेकिन क्या इसकी वजह से संसद के शीत सत्र रद्द करना जायज़ है? संविधान कहता है कि संसद के दो सत्रों के बीच में छह महीने से ज्यादा का अंतराल नहीं हो सकता है. इस लिहाज से जो हुआ वह असंवैधानिक नहीं है. लेकिन परंपरा कहती है कि भारत में हर साल संसद के तीन सत्र – बजट सत्र, मानसून सत्र और शीत सत्र – होते हैं. लोकतंत्र में परंपराओं का महत्व संवैधानिक व्यवस्थाओं से कम नहीं होता.

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मोदी सरकार का कहना है कि इस मामले में ज्यादातर राजनीतिक दल एकमत थे कि कोविड-19 की वजह से संसद के शीत सत्र को रद्द कर देना चाहिए. इसमें अचरज जैसी कोई बात नहीं है. पिछले काफी समय से संसद जिन कुछ मसलों पर एकमत या भारी बहुमत से सहमत होती दिखती है उनमें से एक इसके सदस्यों की तनख्वाह बढ़ाने का मुद्दा है और दूसरा इसके वर्तमान सदस्यों के हितों के खिलाफ जाने वाला महिला आरक्षण का मुद्दा. लेकिन यहां सवाल यह पूछा जा सकता है कि अगर सितंबर 2020 में संसद के मानसून सत्र को तब बुलाया जा सकता था जब हर रोज 95000 से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो रहे थे, तो अब तो यह आंकड़ा काफी कम है. और अगर ब्रिटेन की संसद – हाउस ऑफ कॉमंस – सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के पालन और कुछ सदस्यों की ऑनलाइन उपस्थिति के साथ काम कर सकती है तो भारतीय संसद ऐसा क्यों नहीं कर सकती?

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हाल ही में बिहार में चुनाव और मध्य प्रदेश में उपचुनाव हुए. हैदराबाद और कश्मीर सहित कई राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव भी हुए. बंगाल के चुनावों की तैयारी भी ज़ोर-शोर से चल रही हैं. जिन राज्यों में चल सकती थीं वहां जमकर सरकारें तोड़ने-बचाने की कवायदें चलीं, आगे भी चलेंगीं. इन सभी में देश के सबसे बड़े नेताओं ने बिना कोविड के बारे में सोचे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जब वहां सत्ता के लिए आम से लेकर सबसे खास तक की सुरक्षा सुनिश्चित या दरकिनार की जा सकती है तो संसद में देश के लिए कुछ दिन काम करना इतनी बड़ी समस्या क्यों है?

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केंद्र और राज्य सरकारें अब लोगों को सावधानी के साथ काम पर जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं. केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग भी अपना-अपना काम कर रहे हैं. पुलिस, चिकित्सा, सफाई और परिवहन जैसे विभागों में काम करने वालों को देश अपना हीरो मान रहा है और ताली-थाली बजाकर उनका सम्मान और उत्साह बढ़ा रहा है. ऐसे में देश की सर्वोच्च संस्था में काम करने वाले सबसे शक्तिशाली लोग संसद को बंद करके किस तरह का संदेश दे रहे हैं? क्या 130 करोड़ लोगों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोग अपनी सुरक्षा का भी ठीक से इंतज़ाम नहीं कर सकते ताकि देश को लोकतांत्रिक और सुरक्षित तरीके से चलाया जा सके?

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हमारे सांसदों को तनख्वाह ठीक मिलती है लेकिन उतनी ज्यादा भी नहीं मिलती. इसकी भरपायी घर, दफ्तर, सुरक्षा, सहायकों, सस्ती या मुफ्त यात्रा आदि से हो जाती है. देश में इस वक्त लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. अपना व्यापार करने वाले करोड़ों लोग तमाम मुश्किलों से गुज़र रहे हैं और नौकरी करने वालों में से कइयों को आधी-अधूरी तनख्वाहें ही मिल रही हैं. ऐसे में केवल 33 दिन ही संसद में जाकर पूरी तनख्वाह लेने वाले हमारे सांसद किस तरह का संदेश दे रहे हैं. क्या यह थोड़ा अजीब नहीं है कि जब लाखों किसान कंपकंपाती सर्दी में संसद में बने एक कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं तब संसद हर मर्यादा और परंपरा के परे जाकर उनके बारे में विचार करने के बजाय ऐसा ही करके छुट्टी पर चली गई है.

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