निकोलस मादुरो और व्लादिमीर पुतिन

विचार-रिपोर्ट | विदेश

रूस और चीन वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का साथ क्यों दे रहे हैं?

रूस और चीन का समर्थन वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के लिए जीवनरेखा साबित हुआ है

अभय शर्मा | 13 फरवरी 2019 | फोटो : रूसी राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन)

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पिछले दिनों वेनेजुएला में प्रमुख विपक्षी नेता खुआन गोइदो ने खुद को देश का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया. इसके बाद अमेरिका ने उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता दे दी और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये. अमेरिका के बाद लैटिन अमेरिका और यूरोप के कई देशों ने भी गोइदो के नाम पर अपनी सहमति जता दी. माना जाने लगा कि निकोलस मादुरो अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते अब कुछ ही घंटों में सत्ता छोड़ देंगे. लेकिन, रूस और चीन का समर्थन मिलने के बाद मादुरो ने अमेरिका पर जमकर हमला बोला और उससे राजनयिक संबंध तोड़ने की घोषणा कर दी.

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वेनेजुएला में जारी संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर रूस और चीन अन्य देशों से अलग राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का साथ क्यों दे रहे हैं. वे एक ऐसे राष्ट्रपति के पक्ष में क्यों हैं जिसके खिलाफ वहां की अधिकांश जनता सड़कों पर प्रदर्शन कर रही है और जो देश में आम चुनाव कराने से साफ़ इनकार कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसकी कई वजहें बताते हैं.

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जानकारों के मुताबिक चीन वेनेजुएला को सबसे ज्यादा कर्ज देने वाला देश है. इसके अलावा बीते 12 सालों में चीनी कंपनियों ने वेनेजुएला में करीब 20 अरब डॉलर का निवेश किया है. अब चीन को डर है कि अगर निकोलस मादुरो सत्ता से हट गए तो उसका भारी नुकसान हो सकता है. उधर रूस और वेनेजुएला के संबंध राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के समय से बेहतर बने हुए हैं. लैटिन अमेरिका में वेनेजुएला एक मात्र ऐसा देश है जो हर मुद्दे पर रूस के साथ खड़ा रहा है. पिछले कुछ समय में वो रूस का बेहद महत्वपूर्ण व्यवसायिक साझेदार भी बन गया है.

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विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि रूस द्वारा वेनेजुएला को बड़ी मदद दिए जाने के पीछे एक मात्र मकसद अमेरिका के गढ़ माने-जाने वाले लैटिन अमेरिका में अपने पैर जमाना रहा है और वह अपनी इस कोशिश में काफी हद तक कामयाब भी हो गया है. बीते दिसंबर में ही रूस और वेनेजुएला ने इस क्षेत्र में एक सैन्याभ्यास किया था. इस अभ्यास में अमेरिका के न चाहते हुए भी रूस के वे लड़ाकू विमान शामिल हुए थे, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं.

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कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने कई साल पहले से ही रूस और चीन से संबंध अच्छे करने शुरू कर दिए थे. मादुरो जानते थे कि वे इन दोनों देशों के जरिए हर मोर्चे पर अमेरिका और यूरोप सामना कर सकते हैं. साथ ही चीन और रूस का सबसे बड़ा फायदा उन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मिलेगा. उन्हें पता है कि ये दोनों देश वहां पर वेनेजुएला के खिलाफ लाये गए हर प्रस्ताव को वीटो कर सकते हैं.

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