रजनीकांत

विचार-रिपोर्ट

क्या रजनीकांत तमिलनाडु में वह करिश्मा दोहरा सकते हैं जो 70 के दशक में एमजीआर ने किया था?

तमिल पत्रिका तुगलक के संपादक एस गुरुमूर्ति मानते हैं कि रजनीकांत तमिलनाडु में एक बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं

ब्यूरो | 15 दिसंबर 2020 | फोटो: यूट्यूब स्क्रीनशॉट

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तमिलनाडु में सत्ताधारी एआईएडीएमके और विपक्षी डीएमके पास 18-20 फीसदी कोर वोट हैं. यानी ये हमेशा उनके साथ ही रहते हैं. बाकी के जो वोट उन्हें मिलते हैं वे उन लोगों के होते हैं जो एक खेमे से नाराज होने पर दूसरे खेमे के पास चले जाते हैं. यानी दोनों पार्टियों का आधार उतना बड़ा नहीं है जैसा उनके वोटों को देखकर लगता है.

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अगर कोई तीसरा विकल्प मौजूद हो तो इधर से उधर जाने वाले वोटर इस बार डीएमके के बजाय इस विकल्प के साथ जा सकते हैं. एमजीआर के साथ 1973 में ऐसा ही हुआ था. तमिलनाडु में करीब पांच दशक से सत्ता या तो डीएमके के पास रही है या फिर उस पर एआईएडीएमके का कब्जा रहा है. लोग अब इन दोनों दलों से ऊब चुके हैं. लेकिन उनके पास अब तक कोई विकल्प नहीं था. रजनीकांत के राजनीति में आने से यह स्थिति बदल गई है.

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तमिलनाडु की राजनीति व्यक्तिकेंद्रित रही है. लेकिन कुछ समय पहले करुणानिधि और जयललिता जैसे दिग्गजों के निधन से वहां एक शून्य पैदा हो गया है. रजनीकांत इस खाली जगह को भर सकते हैं. उनका करिश्मा वैसा ही है जैसा 70 के दशक में एमजीआर (एमजी रामचंद्रन) का था. एमजीआर की तरह रजनीकांत की छवि भी फिल्म स्टार के साथ-साथ एक अच्छे इंसान की भी है. लोग मानते हैं कि वे एक ईमानदार शख्स हैं जो तमिलनाडु के लिए कुछ अच्छा करना चाहता है.

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रजनीकांत की ख्याति इसलिए भी है कि वे फिल्म जगत और इसके बाहर भी लोगों की काफी मदद करते हैं. उनकी व्यक्तिगत स्वीकार्यता बहुत ज्यादा है. इसके अलावा उन्हें निश्चित रूप से अलगाववाद की उस राजनीति का विकल्प कहा जा सकता है जो द्रविड़ आंदोलन से जुड़ी है. एमजीआर की तरह रजनीकांत भी राष्ट्रवादी हैं और वे किसी भी तरह के अलगाववाद को समर्थन नहीं देंगे. रजनीकांत का झुकाव अध्यात्म की तरफ भी है जिसकी तुलना 1950 और 60 के दशक में राज्य की सत्ता में रहे कांग्रेस के नरम हिंदूवाद से की जा सकती है. ये सारी बातें उनके पक्ष में जाती हैं.

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तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव भले ही कुछ महीने दूर हो, लेकिन रजनीकांत के राजनीति में आने का असर उससे पहले ही राज्य की सभी पार्टियों पर पड़ सकता है. मसलन डीएमके में काफी लोग पार्टी मुखिया स्टालिन के बेटे उदयनिधि (पार्टी की युवा इकाई के सेक्रेटरी) को मिल रही बहुत ज्यादा तवज्जो से खुश नहीं हैं. इसी तरह एआईडीमके के भीतर भी असंतोष है. करुणानिधि और जयललिता इससे निपट सकते थे. लेकिन वे दोनों अब नहीं हैं तो दोनों पार्टियों के असंतुष्टों का एक तबका रजनीकांत के साथ जा सकता है.

(द हिंदू को दिये एस गुरुमूर्ति के साक्षात्कार पर आधारित)

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