प्रणब मुखर्जी

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

क्या प्रणब मुखर्जी की किताब को लेकर उनके बच्चों का झगड़ा सिर्फ आपसी है?

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब को उनके बेटे अभिजीत बनर्जी छपने से रोकना चाहते हैं जबकि उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी इसे गलत मानती हैं

ब्यूरो | 19 दिसंबर 2020 | फोटो : pranabmukherjee.nic.in

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दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी का संस्मरण ‘द प्रेसिडेंशियल इयर्स’ अगले महीने प्रकाशित होने वाला है. इस किताब में उन्होंने पश्चिम बंगाल के एक गांव में बिताए बचपन से लेकर राष्ट्रपति रहने तक के अपने लंबे सफर पर रोशनी डाली है. लेकिन इसके प्रकाशित होने से पहले ही इस पर विवाद शुरू हो गया है. यह विवाद उनके अपने बेटे और बेटी के बीच हुआ है. प्रणब मुखर्जी के बेटे और पूर्व लोकसभा सांसद अभिजीत मुखर्जी ने संस्मरण के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताई है. उन्होंने प्रकाशन से पहले इसकी पांडुलिपि देखने की मांग की है. उधर, शर्मिष्ठा मुखर्जी अपने भाई की आपत्ति को गलत बता रही हैं. उन्होंने अभिजीत को सस्ती लोकप्रियता से बचने की नसीहत भी दी है.

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अभिजीत मुखर्जी ने किताब के प्रकाशक रूपा बुक्स और इसके प्रमुख कपिश मेहरा को एक ट्वीट में टैग करते हुए लिखा, ‘मैं ‘द प्रेसिडेंशियल इयर्स’ के लेखक का बेटा, आपसे अनुरोध करता हूं कि बिना मेरी लिखित सहमति के किताब का प्रकाशन और इसके चुनिंदा हिस्सों को जारी करना बंद कर दीजिए…’ अभिजीत मुखर्जी का कहना है कि किताब के जिस हिस्से को मीडिया में जारी किया गया वह राजनीति से प्रेरित है. अभिजीत मुखर्जी ने इस बाबत प्रकाशक को एक पत्र भी भेजा है. अपने ट्वीट और इस पत्र में अभिजीत मुखर्जी ने यह भी लिखा है कि ‘मेरे पिता का निधन हो चुका है और मैं उनका बेटा होने के नाते प्रकाशित होने से पहले किताब की फाइनल कॉपी देखना चाहता हूं. मेरा मानना है कि अगर मेरे पिता जिंदा होते तो वे भी ऐसा ही करते. इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि जब तक मैं किताब को देख न लूं और लिखित सहमति न दे दूं, तब तक इसे नहीं छापें.’

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अपने भाई के ट्वीट पर पलटवार करते हुए कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भी ट्वीट किए. इनमें उन्होंने लिखा, ‘मैं संस्मरण के लेखक की पुत्री के तौर पर अपने भाई अभिजीत मुखर्जी से आग्रह करती हूं कि वे हमारे पिता द्वारा लिखी गई अंतिम पुस्तक के प्रकाशन में अनावश्यक अवरोध पैदा न करें. वे (प्रणब मुखर्जी) बीमार होने से पहले ही इसे पूरा लिख चुके थे. पुस्तक के साथ मेरे पिता हस्तलिखित नोट और टिप्पणियां हैं जिनका पूरी सख्ती से पालन किया गया है. उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को सस्ते प्रचार के लिए इसे प्रकाशित होने से रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए. यह हमारे दिवंगत पिता के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा…’

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प्रणब मुखर्जी के बेटे और बेटी के इस झगड़े को लेकर कई जानकार मानते हैं कि इसकी वजह किताब में उठाये गए कांग्रेस के अंदरूनी मामले हैं. इस वजह से अभिजीत बनर्जी को पार्टी और इसके शीर्ष नेतृत्व की किरकिरी होने का डर सता रहा है. उन्हें चिंता है कि पुस्तक के कुछ हिस्से सोनिया गांधी को अपमानित कर सकते हैं और इससे पार्टी के भीतर उनकी संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं. बीते हफ्ते किताब के प्रकाशक ने इसके कुछ अंशों को सार्वजनिक किया था. इनमें प्रणब मुखर्जी ने 2014 के लोकसभ चुनाव में करारी शिकस्त के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने लिखा है, ‘कांग्रेस के कुछ नेताओं का मत था कि अगर मैं 2004 में प्रधानमंत्री बन गया होता तो 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली हार टल सकती थी. हालांकि, मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूं लेकिन मुझे विश्वास है कि मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद पार्टी नेतृत्व का राजनीतिक फोकस खो गया. सोनिया गांधी पार्टी के मामलों को संभाल नहीं पा रही थीं और डॉक्टर मनमोहन सिंह की सदन से लंबे समय तक अनुपस्थिति के कारण अन्य सांसदों के साथ व्यक्तिगत संपर्क का अंत हो गया.’

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संस्मरण के अंशों से यह भी पता चलता है कि इसमें प्रणब मुखर्जी ने न सिर्फ मनमोहन सिंह बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर भी खुलकर चर्चा की है. संस्मरण में प्रणब मुखर्जी के हवाले से लिखा गया है, ‘मेरा मानना है कि शासन करने की नैतिक शक्ति प्रधानमंत्री के पास होती है. सामान्य तौर पर देश की दशा प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन के काम करने के तौर-तरीके पर निर्भर करती है… मनमोहन सिंह गठबंधन को बचाने के बारे में सोचते रहे, जिसका असर शासन-व्यवस्था पर हुआ.’ मुखर्जी ने नरेंद्र मोदी के बारे में लिखा है, ‘ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान मनमाने तरीके से शासन किया जिससे सरकार, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधों में कटुता आई. केवल समय ही बता सकेगा कि उनकी सरकार के दूसरे कार्यकाल में इन मसलों पर बेहतर समझ विकसित हो सकेगी या नहीं…’

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