ममता बनर्जी

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने के तरीके को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना करना कितना जायज़ है?

पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव करवाए जा रहे हैं और कई जिलों में तीन-तीन चरणों में मतदान होगा

ब्यूरो | 05 मार्च 2021 | फोटो : टीएमसी

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तारीखों का ऐलान

बीते शुक्रवार को चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सहित चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया. आयोग ने पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा आठ चरणों में मतदान कराने का फैसला किया है. राज्य में 27 मार्च को पहले चरण का और 29 अप्रैल को आठवें चरण का मतदान होगा, मतों की गिनती दो मई को की जाएगी. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव आठ चरणों में संपन्न कराए जाने की घोषणा के बाद से चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और वाममोर्चे के निशाने पर है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सवाल उठाते हुए कहा, ‘जब दूसरे राज्यों में एक, दो या तीन चरणों में चुनाव हो रहा है तो पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव कराने की घोषणा क्यों की गई है? क्या भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए बंगाल में चुनाव को आठ चरणों में बांटा गया है? क्या चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के कहने पर ऐसा कर रहा है?’ उधर, भाजपा नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था के हालात को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने एकदम सही फैसला लिया है, इससे आम लोगों में फैली दहशत खत्म होगी और मतदान को लेकर उनका मनोबल बढ़ेगा. आठ चरणों में विधानसभा चुनाव कराने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है. अधिवक्ता मोहनलाल शर्मा द्वारा दाखिल की गयी याचिका में कोर्ट से इस फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई है.

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आठ चरणों के अलावा इस बार चुनाव आयोग के फैसले में क्या अलग है?

पश्चिम बंगाल में इस बार एक लाख से ज्यादा मतदान केंद्रों पर वोट डाले जाएंगे. मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि राज्य में 2016 में 77,413 मतदान केंद्र बनाये गए थे, अब 1,01,916 मतदान केंद्र होंगे. हर मतदान केंद्र पर केवल एक हजार लोग ही वोट डाल पाएंगे, बीते विधानसभा चुनाव में हर बूथ पर यह संख्या 1500 थी. आगामी चुनाव को लेकर आयोग ने एक ऐसा फैसला भी लिया है, जो पश्चिम बंगाल में पहले कभी नहीं लिया गया. राज्य के कई जिले ऐसे हैं, जिनमें दो से तीन चरणों में वोट डाले जाएंगे. जिन जिलों में एक से ज्यादा चरणों में चुनाव होने हैं, उनमें मुर्शिदाबाद, हावड़ा, दक्षिण 24 परगना, पूर्व मिदनापुर और नदिया शामिल हैं. राजधानी कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में 26 अप्रैल को और उत्तरी हिस्से में 29 अप्रैल को मतदान होगा. लेकिन इसके बाकी इलाकों में 10 अप्रैल को ही मतदान हो जाएगा. यानी कोलकाता के मतदाता तीन अलग-अलग दिनों में मतदान करेंगे जो पहले कभी नहीं देखा गया. टीएमसी और वाम मोर्चे के प्रमुख घटक माकपा ने चुनाव आयोग से सवाल किया है कि एक जिले में दो या तीन चरण में चुनाव कराने का क्या मतलब है? माकपा के वरिष्ठ नेता विमान बोस के मुताबिक वे 1958 से चुनाव होते देख रहे हैं, लेकिन आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि एक जिले को दो या तीन भागों में बांटकर चुनाव कराया गया हो.

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चुनाव आयोग ने अपने फैसले के पीछे क्या कारण बताया है?

चुनाव आयोग ने अपने फैसले के पीछे कोरोना संकट, त्यौहारी सीजन और हिंसा को वजह बताया है. आयोग के मुताबिक राज्य में चुनावी हिंसा का जो इतिहास रहा है, उसे देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए सुरक्षा बलों की सटीक तैनाती जरूरी है. आठ फेज़ में चुनाव करवाने से सुरक्षा बलों की बेहतर तरीके से तैनाती की जा सकेगी और इससे कानून और व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलेगी. एक ही जिले में कई फेज में चुनाव करवाने को लेकर अधिकारियों का कहना है कि इस तरह का फैसला बेहद संवेदनशील इलाकों में लिया गया है जिससे बिना हिंसा के चुनाव करवाया जा सके और असामाजिक तत्वों को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सके. उदाहरण के तौर पर देखें तो दक्षिण 24 परगना जिले में मतदान एक से ज्यादा चरणों में होगा. यह वही जिला है जहां पिछले साल दिसंबर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था. कुछ राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि दक्षिण 24 परगना और उसके आसपास के इलाके अति संवेदनशील की सूची में आते हैं और इनमें कई चरणों में चुनाव कराने का फैसला सही लगता है. इन लोगों के मुताबिक पिछले पंचायत चुनाव में दक्षिण 24 परगना जिले में काफी हिंसा हुई थी और 85 फीसदी से ज्यादा सीटों पर टीएमसी बगैर चुनाव लड़े ही जीत गयी थी, ज्यादातर सीटों पर इसका कारण विपक्षियों में सत्ता पक्ष का डर बताया जाता है.

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आठ चरणों में चुनाव होने से टीएमसी परेशान क्यों है?

आठ चरणों में होने वाला विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी के लिए सरदर्द बन गया है. पार्टी से जुड़े कुछ सूत्रों के मुताबिक टीएमसी में ममता बनर्जी ही सबसे बड़ा चेहरा हैं और उन्हें ही पूरे चुनाव प्रचार की कमान संभालनी है. ममता बनर्जी का लक्ष्य मतदान से पहले लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में रैली करने का था. लेकिन जिस तरह का चुनावी कार्यक्रम चुनाव आयोग ने घोषित किया है, उसमें ऐसा कर पाना बेहद मुश्किल है. दरअसल, कई ऐसे चरण हैं जिनमें उत्तरी और दक्षिणी बंगाल के कई जिलों में एक ही तारीख को मतदान होगा. ऐसे में दोनों हिस्सों में ज्यादा दूरी होने की वजह से ममता के लिए ज्यादा रैली करना सम्भव नहीं हो सकेगा. बताया जाता है कि अब टीएमसी के चुनाव प्रबंधक पार्टी के पूरे चुनाव प्रचार अभियान पर फिर से विचार कर रहे हैं और एक नई योजना तैयार कर रहे हैं. इसके अलावा टीएमसी की एक परेशानी यह भी है कि दक्षिण 24 परगना, पूर्व मिदनापुर, कोलकाता, नदिया और हावड़ा जैसे राज्य के दक्षिणी हिस्से के जिन जिलों में कई चरणों में चुनाव होने हैं, वे टीएमसी के गढ़ माने जाते हैं. ऐसे में टीएमसी नेताओं को लगता है कि इन जिलों में अलग-अलग फेज में चुनाव करवाने से भाजपा को अपनी स्थिति मजबूत करने का ज्यादा मौका मिलेगा.

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यह चुनाव कार्यक्रम भाजपा के लिए क्यों फायदेमंद माना जा रहा है?

टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने यह आरोप भी लगाया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखें ऐसे सेट की गई हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह दूसरे राज्यों में चुनाव प्रचार के साथ ही यहां भी भरपूर समय दे सकें. ममता के आरोपों से इतर अगर क्षेत्रों के हिसाब से चुनाव की तारीखों पर गौर करें तो ऐसा लगता भी है. बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चुनाव प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और जेपी नड्डा हैं. लेकिन इन नेताओं को बंगाल के अलावा अन्य चार राज्यों में भी रैलियां करनी हैं. इस वजह से प्रचार के दौरान ये नेता ज्यादा व्यस्त रहेंगे और बंगाल के लिए ज्यादा समय निकालना मुश्किल होगा. लेकिन बंगाल का चुनाव आठ चरणों में होने के चलते इन नेताओं को बंगाल में प्रचार करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा क्योंकि पहले तीन चरणों में ही अन्य सभी राज्यों में चुनाव खत्म हो जाएगा. पश्चिम बंगाल के चुनाव कार्यक्रम और भाजपा से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प बात यह है कि चुनाव के शुरूआती तीन चरणों में राज्य के जिन क्षेत्रों में मतदान होगा, उनमें से अधिकांश में भाजपा बेहद मजबूत मानी जाती है. यानी जब भाजपा के शीर्ष नेता अन्य चुनावी राज्यों में भी प्रचार करने में व्यस्त होंगे तो बंगाल में पार्टी के मजबूत क्षेत्रों में ही चुनाव हो रहा होगा. और जब अन्य राज्यों में चुनाव निपट जाएंगे तो ये भाजपा नेता अगले पांच चरणों तक बंगाल के उन इलाकों में भरपूर समय दे सकते हैं, जहां पार्टी ज्यादा मजबूत स्थिति में नहीं मानी जाती है.

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