जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

प्रशांत किशोर के आने से जेडीयू को कौन से पांच फायदे हो सकते हैं?

चुनावी रणनीतिकार के रूप में मशहूर प्रशांत किशोर को हाल ही में नीतीश कुमार ने जेडीयू का उपाध्याक्ष बनाया है

ब्यूरो | 30 नवंबर 2018 | फोटो: फेसबुक

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बिहार में पिछले दिनों अच्छे ढंग से यह प्रचारित किया गया कि प्रशांत किशोर ब्राह्मण समुदाय से हैं. जानकारों का मानना है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में जिस तरह का समीकरण दलितों और ब्राह्मणों को मिलाकर बनाया था, कुछ-कुछ वैसा ही नीतीश कुमार भी करने की कोशिश में हैं. अगर बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग और ब्राह्मणों की गोलबंदी हो जाती है तो इससे जेडीयू की राजनीतिक पूंजी मजबूत होगी.

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कहा ये भी जा रहा है कि राजद के नए नेता तेजस्वी यादव के मुकाबले जदयू के पास कोई युवा और विश्वस्त चेहरा नहीं था. जो युवा नेता जेडीयू में थे भी उनमें से किसी की ऐसी राज्य स्तरीय पहचान नहीं थी कि वह तेजस्वी के विकल्प के तौर पर दिख सके. प्रशांत किशोर इस कमी को पूरा कर सकते हैं. जदयू के एक पूर्व सांसद के मुताबिक उनके जरिए नीतीश कुमार युवाओं के बीच जेडीयू को मजबूत करने की कोशिशें कर सकते हैं. इस तरह जेडीयू को धीरे-धीरे हर जाति और वर्ग के युवाओं की पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की जा सकती है.

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प्रशांत किशोर के एक पुराने सहयोगी की मानें तो जदयू के लिए उनकी एक उपयोगिता यह भी हो सकती है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार के लिए बड़ी भूमिका की पटकथा तैयार करें. पहले भी प्रशांत किशोर इसके लिए कोशिशें कर चुके हैं.

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प्रशांत किशोर ने उपाध्यक्ष बनने के बाद यह स्पष्ट कर दिया है कि वे दस साल तक चुनावी राजनीति में नहीं आएंगे. उन्होंने साफ कहा है कि वे न तो लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और न ही राज्यसभा में जाएंगे बल्कि संगठन के लिए काम करेंगे. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 2020 के विधानसभा चुनावों में 25-30 युवाओं को टिकट दिया जा सकता है. माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर जेडीयू के संगठन को मजबूत करने और इसके भीतर एक युवा नेतृत्व विकसित करने का काम कर सकते हैं.

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प्रशांत किशोर की उपयोगिता यह भी बताई जा रही है कि उनकी विशेषज्ञता का फायदा बिहार के शासन तंत्र के आधुनिकीकरण के लिए किया जा सकता है. बिहार सरकार के एक अधिकारी बताते हैं कि विश्व बैंक और कई दूसरी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से बिहार सरकार को कई बार इसलिए भी वित्तीय सहायता नहीं मिल पाती क्योंकि राज्य का शासन तंत्र उन संस्थाओं के पैमानों पर फिट नहीं बैठता है.

(सत्याग्रह की रिपोर्ट पर आधारित)

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