नेपाल

विचार-रिपोर्ट | विदेश

नेपाल का मौजूदा संकट भारत के लिए दो परिणाम ला सकता है – एक अच्छा और दूसरा बहुत अच्छा

चीनी प्रतिनिधि मंडल के नेपाल से लौटने के बाद अब वहां की राजनीति में जो स्थिति बनती दिख रही है वह भारत के लिए अच्छी खबर है

अभय शर्मा | 04 जनवरी 2021 | फोटो : केपी ओली/ट्विटर

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बीते महीने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अचानक एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से सिफारिश कर नेपाल की संसद भंग करवा दी. उन्होंने अप्रैल 2021 में वहां आम चुनाव कराने की घोषणा भी की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओली ने यह फैसला अपनी पार्टी – नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) – में उनके खिलाफ चल रही गतिविधियों के चलते लिया. नेपाल की सत्ताधारी पार्टी अब दो धड़ों में बंट गयी है. इनमें से एक का नेतृत्व केपी शर्मा ओली कर रहे हैं और दूसरे का पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल (प्रचंड). एनसीपी बनने के बाद इन दोनों को ही पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था. लेकिन अब विपक्षी धड़े ने नाराज होकर ओली को अध्यक्ष और पार्टी के संसदीय दल के नेता के पद से हटा दिया है. साथ ही प्रचंड का नाम संसदीय दल के नेता के रूप में प्रस्तावित किया गया है. इसके बाद ओली गुट ने भी पलटवार करते हुए प्रचंड को अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया.

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साल 2017 में नेपाल में हुए आम चुनाव से पहले केपी ओली और प्रचंड एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी थे. लेकिन, इस चुनाव में ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकजुट मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा. इस गठबंधन को नेपाल की संसद में दो तिहाई बहुमत मिला. इसके एक साल बाद यानी 2018 में इन दोनों पार्टियों का विलय हुआ और एक नए दल ‘नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी’ का गठन हुआ. इन दोनों पार्टियों के गठबंधन और फिर उनके विलय का श्रेय चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को दिया जाता है. जानकारों के मुताबिक चीन ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि 2015 के बाद से वह नेपाल में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है. ऐसे में उसे नेपाल में एक स्थायी और अपने हितों को पोसने वाली सरकार चाहिए थी. 2008 में नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना होने के बाद से यह हिमालयी राष्ट्र दस प्रधानमंत्री देख चुका है.

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बीते महीने जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाली संसद को भंग करने का ऐलान किया और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में दो-फाड़ की खबर आई तो इससे चीन को बड़ा झटका लगा. इसके तुरंत बाद चीन ने ओली और प्रचंड में समझौता कराने के प्रयास शुरू कर दिए. नेपाल में चीन की राजदूत हाओ यांकी ने मामले को सुलझाने के लिए नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी सहित सत्ताधारी पार्टी के कई नेताओं से मुलाक़ात की. लेकिन, बात नहीं बन सकी. इसके बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभाग के बड़े नेताओं का एक प्रतिनिधि मंडल नेपाल आया. इसने राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी, पीएम केपी ओली और पुष्प कमल दहल सहित सत्ताधारी पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं से अलग-अलग बातचीत की.

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केपी शर्मा ओली ओली और प्रचंड के धड़ों का रुख देखकर ऐसा लगता है कि चीनी प्रतिनिधि मंडल की कोशिश फेल हो गयी है. इस प्रतिनिधि मंडल की वापसी के बाद केपी ओली ने अपने गुट को संबोधित करते हुए कहा, ‘प्रचंड नेपाली कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर रहे थे और उसी वक्त मेरे साथ भी मोल-भाव कर रहे थे. मैं उनके साथ समझौते कर-कर के थक चुका हूं.’ अपने संबोधन के अंत में ओली ने जो बात कही उससे पता लगता है कि अब समझौते की गुंजायश न के बराबर है. उन्होंने कहा कि नेपाल के संविधान के हिसाब से संसद को भंग करने का प्रस्ताव वापस नहीं लिया जा सकता. यानी अब दोबारा चुनाव ही एक मात्र विकल्प बचता है. चीनी प्रतिनिधि मंडल के वापस जाने के बाद प्रचंड वाले धड़े ने भी राजधानी काठमांडू में एक बड़ी रैली आयोजित की. इसमें केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री पद से हटाने और संसद को बहाल करने की मांग की गयी. प्रचंड ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी उस याचिका को भी वापस नहीं लिया है जिसमें उन्होंने ओली के संसद भंग करने के फैसले को अलोकतांत्रिक बताते हुए उस पर स्टे लगाने की मांग की है. ओली और प्रचंड दोनों के खेमे पार्टी पर अपना अधिकार जताने के लिए भी चुनाव आयोग में डटे हुए हैं.

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अगर, भारत के लिहाज से देखें तो नेपाली सत्ताधारी पार्टी में हुआ दो-फाड़ उसके लिए अच्छी खबर है. बीते कुछ समय से प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत के कट्टर विरोधी हो गए थे. उन्होंने ही नेपाल में भारत की जगह, चीन को तरजीह दी. नेपाल के अन्य प्रमुख नेताओं की बात करें तो पुष्प कमल दहल (प्रचंड) भारत को लेकर सॉफ्ट रहे हैं, जबकि वहां की दूसरी बड़ी पार्टी ‘नेपाली कांग्रेस‘ भारत की करीबी मानी जाती है. नेपाल की सियासत में आगे दो स्थितियां बनती दिख रही हैं, पहली अगर नेपाली सुप्रीम कोर्ट पीएम ओली के निर्णय को गलत ठहराते हुए संसद को बहाल कर देता है तो प्रचंड का खेमा सरकार बनाने का दावा पेश करेगा. ऐसे में उसे शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस के समर्थन की जरूरत होगी. देउबा पहले भी प्रचंड के साथ सरकार बना चुके हैं और फिर से ऐसा कर सकते हैं. यह स्थिति भारत के लिए सबसे अच्छी कही जायेगी. लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला केपी ओली के हक में आता है, तो छह महीने बाद चुनाव होंगे. भारत के लिए यह स्थिति भी वर्तमान स्थिति से बेहतर ही होगी. कोरोना वायरस सहित तमाम मामलों पर केपी ओली सरकार के ढीले रुख की वजह से जनता उनसे नाराज है. ऐसे में दोबारा चुनाव होने पर उनके सरकार में रहने की संभावना ज्यादा है.

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