म्यांमार

विचार-रिपोर्ट | विदेश

जब म्यांमार में चलनी सेना की ही है तो उसे तख्ता पलट करने की क्या जरूरत थी?

म्यांमार के संविधान के मुताबिक सेना सर्वोच्च है और किसी भी सरकार के लिए संविधान में बदलाव कर पाना लगभग असंभव है

अभय शर्मा | 02 फरवरी 2021 | फोटो : आंग सान सू की/फेसबुक

1

तख्ता पलट

भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में बीते सोमवार को एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला. वहां देश की सेना ने तख्ता पलट की कार्रवाई को अंजाम दे दिया. सेना ने एक वर्ष के आपातकाल की घोषणा करते हुए देश की सत्ता को अपने नियंत्रण में ले लिया और म्यामांर की स्टेट काउंसलर (प्रधानमंत्री) आंग सान सू की और राष्ट्रपति यू विन मिंट समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. देश के पहले उप राष्ट्रपति और रिटायर्ड सैन्य अधिकारी माइंट स्वे को म्यांमार का कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया है. कार्यवाहक राष्ट्र्पति के दस्तखत वाली एक घोषणा के मुताबिक देश की सत्ता अब ‘कमांडर-इन-चीफ ऑफ डिफेंस सर्विसेस’ मिन आंग ह्लाइंग के हाथों में रहेगी. जनरल मिन आंग लाइंग ही अब विधायिका, प्रशासन और न्यायपालिका की जिम्मेदारी संभालेंगे. सेना की ओर से कहा गया है कि उसने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि देश की स्थिरता खतरे में थी. म्यांमारी मीडिया के मुताबिक सेना के इस हैरानी भरे फैसले के बाद देश में किसी भी विरोध को कुचलने के लिए सड़कों पर सेना की तैनाती कर दी गयी है और फोन लाइनों को भी बंद कर दिया गया है.

2

संविधान में सेना के अधिकार

म्यांमार की सेना के इस फैसले को समझने के लिए वहां के राजनीतिक ढांचे और संविधान में सेना को दिए गए विशेष अधिकारों के बारे में जानना बेहद जरूरी है. म्यांमार की राजनीति में सेना का हमेशा से ही दबदबा रहा है. साल 1962 में तख्तापलट के बाद से सेना ने देश पर करीब 50 सालों तक प्रत्यक्ष रूप से शासन किया है. म्यांमार में लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग तेज होने पर साल 2008 में म्यांमारी सेना ही नया संविधान लाई थी. इसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था को जगह तो दी गई, लेकिन सेना की स्वायत्तता और वर्चस्व को भी बनाए रखा गया. नए संविधान के तहत सेना प्रमुख को अपने लोगों की नियुक्ति करने और सैन्य मामलों में अंतिम फैसला करने का अधिकार दिया गया. इसके तहत पुलिस, सीमा सुरक्षा बल और प्रशासनिक विभाग का नियंत्रण सेना प्रमुख के पास ही रखा गया और सरकार में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और सीमा मामलों के मंत्री की नियुक्ति भी वही करता है. नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की एक-चौथाई सीटें भी सेना के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा म्यांमार की दो बड़ी कंपनियों का स्वामित्व भी सेना के पास ही है. इन कंपनियों का शराब, तंबाकू, ईंधन और लकड़ी समेत कई अहम क्षेत्रों पर एकाधिकार है. इसके अलावा, सेना प्रमुख कभी भी आपातकाल लगाने और किसी भी चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट करने की ताकत भी रखता है.

3

आम चुनाव के नतीजे और सेना का आरोप

म्यांमार में दो राजनीतिक पार्टियां हैं. एक आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) और दूसरी यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलेपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) है. यूएसडीपी को सेना का समर्थन हासिल है, इसमें अधिकांश नेता सेना के अवकाशप्राप्त अधिकारी ही हैं. इसके मुखिया थान हिताय हैं, जो म्यामांर की सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर जनरल हैं और वर्तमान सेना प्रमुख के करीबी हैं. म्यांमार में बीते साल नवंबर में आम चुनाव हुआ था, इस चुनाव में सेना को अपनी पार्टी के भारी बहुमत से सत्ता में आने की उम्मीद थी. लेकिन चुनाव नतीजे उसकी उम्मीदों से एकदम उलट आये. इस चुनाव में आंग सान सू की की पार्टी एनएलडी की एकतरफा जीत हुई. चुनाव नतीजों के बाद से सेना और उसके समर्थन वाली पार्टी लगातार यह आरोप लगाती आ रही है कि चुनाव में बड़ी धांधली हुई है और जान-बूझकर सेना को चुनाव हरवाया गया है. सैन्य प्रवक्ता के मुताबिक उसके अधिकारियों ने 314 चुनावी क्षेत्रों में अस्सी लाख से ज्यादा अनियमितताएं पाई हैं. सेना के प्रवक्ता का यह भी कहना था कि सेना के दबदबे वाले क्षेत्रों में भी उसकी पार्टी की हार यह बताती है कि मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गयी.

4

चुनाव आयोग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की प्रतिक्रिया

म्यांमार की सेना ने चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए देश के चुनाव आयोग, सरकार और निवर्तमान सांसदों से यह मांग की थी कि वे एक फरवरी को शुरू होने वाली नई संसद से पहले सदन का एक विशेष सत्र बुलाकर यह साबित करें कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए थे. चुनाव आयोग ने चुनाव में धांधली के आरोपों को खरिज करते हुए सेना की यह मांग मानने से इनकार कर दिया. आयोग का कहना था कि उसे आम चुनाव में धांधली के कोई सबूत नहीं मिले हैं. इसके अलावा चुनाव के दौरान म्यांमार में मौजूद रहे अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों – कार्टर सेंटर, एशियन नेटवर्क फॉर फ्री इलेक्शन, यूरोपीय संघ के इलेक्शन ऑब्जर्वेशन मिशन के साथ-साथ एक स्थानीय संगठन पीपुल्स अलायंस फॉर क्रेडिबल इलेक्शन ने भी चुनावों में धांधली को पूरी तरह नकार दिया. यूरोपीय संघ ने अपने एक बयान में भी कहा, ’95 फीसदी पर्यवेक्षकों ने म्यांमार की चुनावी प्रक्रिया को अच्छा या बहुत अच्छा माना है.’ म्यांमार के कई स्वतंत्र चुनाव पर्यवेक्षक समूहों ने 21 जनवरी को एक संयुक्त बयान भी जारी किया और कहा, ‘चुनाव के परिणाम विश्वसनीय हैं और बहुसंख्यक मतदाताओं की इच्छा को दर्शाते हैं.’

5

तख्ता पलट की असली वजह

जानकारों के मुताबिक म्यांमार में भले ही आंग सान सू की की पार्टी ने दो तिहाई से ज्यादा सीटें जीत ली हों, लेकिन फिर भी उनकी सरकार सेना के दबदबे को खत्म करने के लिए कानून में अपने मुताबिक बदलाव नहीं कर सकती. दरअसल, सेना द्वारा थोपे गए संविधान के मुताबिक कानून में बदलाव के लिए 75 फीसदी सांसदों की सहमति जरूरी है. लेकिन, इतना समर्थन जुटा पाना नयी सरकार के लिए संभव नहीं है क्योंकि संसद में 25 फीसदी सीटें सेना के लिए पहले से रिजर्व हैं (इसके चलते साधारण बहुमत हासिल करने के लिए भी एनएलडी को बची हुई सीटों में से दो तिहाई से ज्यादा सीटें जीतने की जरूरत थी). साथ ही बीते आम चुनाव में सेना समर्थित पार्टी यूएसडीपी ने भी कुछ सीटें जीती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब म्यामांरी सेना को अपनी स्थिति को लेकर कोई खतरा नहीं है तो फिर उसने तख्ता पलट क्यों किया? कुछ जानकार वर्तमान सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को तख्ता पलट के पीछे की प्रमुख वजह मानते हैं. इनके मुताबिक मिन इस साल तीन जुलाई को 65 साल के हो जाएंगे और इस दिन उन्हें रिटायर होना पड़ेगा. वे 2016 में ही रिटायर होने वाले थे, लेकिन तब उन्होंने अपना कार्यकाल पांच साल आगे बढ़वा लिया था. 2016 के बाद मिन आंग ह्लाइंग ने जिस तरह के कदम उठाये, उनसे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा साफ़ झलकती है. उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की और इस समुदाय के सात लाख लोगों को देश से बाहर कर दिया. इसके बाद वे देश की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच खासे लोकप्रिय हो गए, वे एक राजनेता की तरह अक्सर बौद्ध मठों पर जाकर चंदा भी देने लगे, इसे भी बौद्ध आबादी में पैठ बनाने की उनकी कोशिश की तरह देखा गया. जानकारों की मानना है कि सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग शायद सोचकर बैठे थे कि उनके रिटायरमेंट से पहले सेना समर्थित पार्टी की सरकार बनेगी और वे रिटायर होने के बाद उसका नेतृत्व करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसी वजह से उन्होंने तख्ता पलट का आदेश दे दिया.

  • डॉक्टर

    विचार-रिपोर्ट | कोविड-19

    ऑक्सीजन और आईसीयू के बाद अगला महासंकट डॉक्टरों और नर्सों की कमी के रूप में सामने आ सकता है

    ब्यूरो | 05 मई 2021

    सीटी स्कैन

    ज्ञानकारी | स्वास्थ्य

    कोरोना संक्रमण होने पर सीटी स्कैन कब करवाना चाहिए?

    ब्यूरो | 04 मई 2021

    इंडिगो विमान

    विचार-रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

    पैसे वाले भारतीय इतनी बड़ी संख्या में देश छोड़कर क्यों जा रहे हैं?

    ब्यूरो | 27 अप्रैल 2021

    कोरोना वायरस

    विचार-रिपोर्ट | स्वास्थ्य

    ट्रिपल म्यूटेशन वाला कोरोना वायरस अपने पिछले स्वरूपों से कितना ज्यादा खतरनाक है?

    ब्यूरो | 22 अप्रैल 2021