नरेंद्र मोदी

विचार-रिपोर्ट | किसान

क्या सरकार का यह कहना सही है कि एमएसपी की गारंटी 17 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष का खर्चा है?

मोदी सरकार का कहना है कि उसके लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी देना इसलिए संभव नहीं है क्योंकि इससे सरकारी खजाने पर 17 लाख करोड़ रुपयों का बोझ पड़ेगा

अभय शर्मा | 30 जनवरी 2021 | फोटो : नरेंद्र मोदी/ट्विटर

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मोदी सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली से लगी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा पर किसान आंदोलन कर रहे हैं. ये किसान सरकार से तीनों कानून वापस लेने की मांग तो कर ही रहे हैं साथ में अपनी फसलों पर एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य, वह कीमत जिस पर सरकार किसानों से उनकी फसलें खरीदती है) की कानूनी गारंटी भी मांग रहे हैं. किसानों का कहना है कि सरकार ऐसी कानूनी व्यवस्था बनाये जिससे एमएसपी के दायरे में आने वाली उनकी 23 फसलों की निजी खरीद भी एमएसपी से कम पर नहीं की जा सके. लेकिन सरकार तीनों कानूनों को वापस न लेने की हालत में भी किसानों को ऐसी गारंटी देने के लिए तैयार नहीं है. उसकी तरफ से यह तर्क दिया जा रहा है कि एमएसपी की गारंटी देने पर सरकारी खजाने से हर साल 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. यह देश के बजट का 50 प्रतिशत से ज्यादा है.

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जानकारों की मानें तो सरकार ने 17 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा 23 फसलों के कुल उत्पादन को एमएसपी पर खरीदने के आधार पर निकाला है. सरकार जिन 23 फसलों पर एमएसपी देती है उनमें सात अनाज – गेहूं, धान, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा और रागी – सात तिलहन – सरसों, मूंगफली, रेपसीड, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और काला तिल – के साथ-साथ पांच दालें – मूंग, अरहर, उड़द, चना और मसूर – शामिल हैं. इसके अलावा सरकार हर साल कपास, गन्ना, कच्चा जूट और खोपरा की एमएसपी भी घोषित करती है. ये 23 फसलें भारत की कुल कृषि उपज का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कवर करती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इन सभी फसलों को एमएसपी पर खरीदे, केवल तभी उसे 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे.

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केंद्र सरकार हर साल 23 फसलों की एमएसपी तो घोषित करती है, लेकिन वह इन सभी फसलों को खरीदती नहीं है. वह जिन फसलों को खरीदती है, उनका भी सारा उत्पादन नहीं खरीदती है. जानकारों के मुताबिक केंद्र सरकार एमएसपी के लिए घोषित फसलों में से केवल 10 से 12 ही खरीदती है. इनमें भी वह सबसे ज्यादा गेहूं, चावल और कपास ही खरीदती है. 2019-20 के आंकड़ों को देखें तो सरकार ने गेहूं के कुल उत्पादन का केवल 36 फीसदी, धान का 43 फीसदी और कपास का करीब 30 फीसदी हिस्सा ही खरीदा था. जानकारों का कहना है कि सरकार चाहे भी तो फसलों के उत्पादन का पूरा हिस्सा कभी नहीं खरीद सकती. इनके मुताबिक , एक तो सभी किसान सरकार को अपनी फसलें बेचते नहीं हैं. दूसरा जो बेचते हैं उनमें से कई अपनी सारी फसल उसे नहीं देते हैं. तीसरा, ऐसा हो पाना संभव नहीं है कि निजी व्यापारी फसलों को बिलकुल भी नहीं खरीदें. ऐसे में एमएसपी की कानूनी गारंटी देने का मतलब यह नहीं है कि इसकी वजह से सरकार पर 17 लाख करोड़ का बोझ पड़ जाएगा. किसान आंदोलन में मुख्य भूमिका निभा रहे योगेंद्र यादव इस बारे में कहते हैं, ’17 लाख करोड़ रुपए का नुकसान सरकार को तभी हो सकता है, जब वह सभी 23 फसलों का एक-एक दाना खरीदे और उसे हिन्द महासागर में फेंकने की सोचे.’ उनके मुताबिक अगर सरकार सारी फसलें खरीदती भी है तो वह उसे निर्यात भी करेगी, अपने बाजार में भी बेचेगी और प्राइवेट कंपनियों को भी बेचगी और इससे उसे लाखों करोड़ रुपए मिलेंगे.

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केंद्र सरकार पंजाब में सबसे ज्यादा गेहूं, धान और कपास एमएसपी पर खरीदती है, इस वजह से वहां के (प्राइवेट) बाजार में इन दो फसलों की कीमतों में ज्यादा गिरावट नहीं आती है, बल्कि कई बार प्राइवेट कंपनियां किसानों को एमएसपी से भी ज्यादा दाम दे देती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कंपनियों को पता है कि किसानों के पास एमएसपी पर सरकार को फसल बेचने का विकल्प मौजूद है. जहां पंजाब और हरियाणा में प्राइवेट बाजार में फसल अच्छे दाम पर बिकती है, वहीं बिहार में ऐसा नहीं है. बिहार में फसल खरीद के सरकारी केंद्र काफी कम हैं जिस वजह से सरकारी खरीद काफी कम होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक जहां पंजाब में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के 418 खरीद केंद्र हैं, वहीं बिहार में इनकी संख्या शून्य है. बिहार में राज्य सरकार के 1619 फसल खरीद केंद्र हैं, लेकिन उन पर खरीद न के बराबर ही होती है. सरकारी खरीद की इस स्थिति के चलते बिहार के प्राइवेट बाजार में फसलों का मूल्य एमएसपी से काफी कम बना रहता है और किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है. जानकार कहते हैं कि अगर बाजार में सरकारी खरीद व्यवस्था की अच्छी उपस्थिति का ही किसानों की आमदनी पर इतना सकारात्मक असर देखने को मिलता है तो इसके साथ-साथ अगर एमएसपी की क़ानूनी गारंटी भी हो तो उसका और भी बेहतर असर होना लाजिमी है.

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कई लोगों का मानना है कि अगर मोदी सरकार एमएसपी की गारंटी देने को तैयार हो जाए तो शायद किसान तीनों कानून रद्द करने की अपनी मांग छोड़ देंगे. लेकिन वह ऐसा करने को तैयार नहीं है और कह रही है कि एमएसपी की गारंटी देने पर उसे 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. केंद्र सरकार की यह स्थिति कुछ अजीब से सवाल खड़े करती है. इनमें से सबसे प्रमुख यह है कि सरकार को ऐसा क्यों लगता है कि निजी कारोबारी फसलों को उसके द्वारा निर्धारित एमएसपी पर नहीं खरीदेंगे? अगर निजी कारोबारी एमएसपी पर भी फसलों को नहीं खरीदेंगे तो नये कानून किसानों के हित में कैसे हो सकते हैं? अगर इन कानूनों से किसानों का बहुत ज्यादा फायदा होने वाला है, उन्हें अपनी फसलों की बढ़िया कीमत मिलने वाली है तो फिर वे सरकार को कम पैसों में, एमएसपी पर अपनी फसलें क्यों बेचेंगे? तब सरकार को 17 लाख करोड़ रुपये खर्च हो जाने की चिंता करने की क्या जरूरत है? वैसे इस आंकड़े पर वह पहुंची कैसे यह भी एक सवाल ही है.

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