कोरोना वायरस वैक्सीन

विचार-रिपोर्ट | कोविड-19

क्या अब मोदी सरकार वैक्सीन के मोर्चे पर अपनी नाकामी ढकने की कोशिश कर रही है?

जानकारों के मुताबिक वैक्सीन की भयानक कमी की जो स्थिति बन गई है उससे निपटने के लिए दो विकल्प अपनाए जाने चाहिए थे

ब्यूरो | 15 मई 2021 | फोटो : पिक्सल्स

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कोरोना वायरस से बचाव के लिए लगाई जा रही एस्ट्रा जेनेका की वैक्सीन कोवीशील्ड के दो डोज के बीच का फासला एक बार फिर बढ़ा दिया गया है. अब इसे 12 से 16 हफ्ते कर दिया गया है. अभी तक यह अवधि छह से आठ हफ्ते थी. वैक्सीनेशन को लेकर सरकार द्वारा बनाई गए विशेष समूह ‘द नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन’ (एनटीएजीआई) ने इसकी सिफारिश की थी. इसे एक दूसरे समूह नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीनेशन (एनईजीवीएसी) को भेजा गया जिसने इसे मान लिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने भी इसे मंजूरी दे दी. इससे पहले मार्च में केंद्र ने कोवीशील्ड के दो डोज के बीच की अवधि 28 दिन से बढ़ाकर छह से आठ हफ्ते कर दी थी.

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यह फैसला ऐसे समय में हुआ है जब महाराष्ट्र सहित कई राज्य वैक्सीन की कमी की शिकायत कर रहे हैं और इसके चलते एक बार फिर केंद्र सरकार पर सवाल उठ रहे हैं. आरोप लग रहे हैं कि वैक्सीन के दो डोज के बीच फासला बढ़ाने का यह फैसला उस कुप्रबंधन को छिपाने की एक और कवायद है जो सरकार ने इस मामले में शुरुआत से ही दिखाया. विपक्ष का कहना है कि इसके चलते ही दुनिया में वैक्सीन के सबसे बड़े उत्पादक भारत को वैक्सीन के लाले पड़ गए हैं. इस आरोप का कारण दो डोज के बीच लगातार बढ़ाया जा रहा फासला ही नहीं है. एनटीएजीआई ने यह भी कहा है कि जिन लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है उन्हें इससे उबरने के बाद वैक्सीन लगवाने के लिए अब छह महीने का इंतजार करना चाहिए. पहले अलग-अलग स्रोतों के हिसाब से यह अवधि दो से तीन महीने तक बताई जा रही थी.

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भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीनेशन के लिए उम्र सीमा घटाकर 18 वर्ष करने के बाद वैक्सीन की मांग अचानक काफी बढ़ गई है. इसके हिसाब से आपूर्ति नहीं हो पा रही है. यहां तक कि 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को उनकी दूसरी डोज़ भी आसानी से नहीं मिल पा रही है. कई जानकारों के मुताबिक ऐसे में केंद्र सरकार के सामने उन समूहों का वैक्सीनेशन कुछ समय के लिए टालने के अलावा कोई विकल्प नहीं है जो किसी न किसी वजह से कोरोना से कुछ हद तक सुरक्षित हो रहे हैं. हालांकि एनटीएजीआई ने इस तरह की बातों को बेबुनियाद बताया है. एनडीटीवी से बातचीत में इसके एक सदस्य एनके अरोड़ा का दावा है कि ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य मिले हैं जो बताते हैं कि कोवीशील्ड के दो डोज के बीच का फासला अगर तीन महीने का हो तो वैक्सीन का असर बढ़ जाता है.

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इस मामले में अपनी लापरवाही पर परदा डालने की कोशिश का आरोप मोदी सरकार पर बीते दिनों तब भी लगा था जब उसने वैक्सीन संकट के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार बताया था. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना था कि वैक्सीन की कोई कमी नहीं है और यह राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे टीकाकरण केंद्र पर समयबद्ध तरीके से इसकी सप्लाई सुनिश्चित करवाएं. गुरुवार यानी 14 मई को कई राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ एक बैठक में भी हर्षवर्धन ने राज्यों की ओर से वैक्सीन की कमी का सवाल उठाए जाने पर नाराजगी जताई. उन्होंने इसे ओछी राजनीति और केंद्र सरकार की छवि खराब करने की कोशिश बताया. स्वास्थ्य मंत्री का यह भी कहना था कि अब राज्य वैक्सीन कंपनियों से सीधे वैक्सीन खरीद सकते हैं तो इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए. उधर राज्यों का कहना है कि जब वैक्सीन हैं ही नहीं तो वे उन्हें खरीदें कैसे.

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जानकारों के मुताबिक वैक्सीन की भयानक कमी की जो स्थिति बन गई है उससे निपटने के लिए दो विकल्प अपनाए जाने चाहिए थे. पहला – सरकार बड़े पैमाने पर वैक्सीन का आयात करती. दूसरा-भारत में ही विकसित कोवैक्सीन का लाइसेंस देश की सभी वैक्सीन निर्माता कंपनियों को देकर उन्हें युद्ध स्तर पर उत्पादन के लिए कहा जाता. भारत में 20 से ज्यादा कंपनियों के पास अपने वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं और इनके चलते देश वैक्सीन के हर साल दो अरब डोज बना सकता है. वैसे देर से ही सही, सरकार अब चेतती दिख रही है. केंद्र ने कहा है कि जो भी कंपनियां कोवैक्सीन बनाना चाहती हैं उनका स्वागत है. इसके अलावा उसने यह ऐलान भी किया है कि अमेरिकी नियामक एफडीए और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने जिन भी वैक्सीनों को मंजूरी दी है वे सभी भारत आ सकती हैं. इनमें फाइजर और मॉडेर्ना की वैक्सीनें भी शामिल हैं. लेकिन सवाल यह है कि उसने बहुत आसान से ये काम करने में इतनी देर क्यों कर दी?

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