किसान आंदोलन

विचार-रिपोर्ट | किसान

क्या किसान आंदोलन कमजोर होता जा रहा है?

मीडिया में लगातार इस तरह के दावे किये जा रहे हैं लेकिन किसान आंदोलन के नेताओं में से एक दर्शनपाल सिंह इनसे इत्तेफाक नहीं रखते हैं

ब्यूरो | 03 मार्च 2021 | फोटो : योगेंद्र यादव/फेसबुक

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सरकार से अब किसानों की बातचीत क्यों नहीं हो रही है?

देखिये इसके दो पहलू हैं. एक पहलू तो ये है कि सरकार को शायद ये लगता है कि आंदोलन लंबा होने की वजह से और मौसम बदलने की वजह से इसमें शामिल लोगों में थकावट आएगी, वे ऊबेंगे और अपने घर चले जाएंगे. आने वाले समय में (अप्रैल से) खेतों में फसल की कटाई भी शुरू हो जायेगी तो सरकार को लग रहा होगा कि किसान कटाई के दौरान खेतों में चले जाएंगे और आंदोलन खत्म हो जाएगा. सरकार शायद इसलिए लंबा खींचना चाहती है… लेकिन, अगर सरकार को उसकी एजेंसियां बता रही होंगी तो उसे ये पता होना चाहिए कि लंबे आंदोलन करने वाले लोग इतनी जल्दी ना ही थकते हैं और ना ही ऊबते हैं. इस आंदोलन पर भी ऐसी चीजों का कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, इसमें दूसरा पहलू यह भी हो सकता है कि शायद सरकार सोच रही हो कि ग्यारह दौर की बातचीत के दौरान किसान संगठनों ने उसकी कोई बात नहीं मानी इसलिए अब इन्हें आपस में पहले कुछ तय करने दो, फिर इनसे बातचीत करेंगे.

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क्या किसान नेता बातचीत की पहल न करके ऐसे ही बैठे रहेंगे?

हमारा सोचना यह है कि कोई भी आंदोलन बैठने से कामयाब नहीं होता है. आंदोलन में जिन दो पक्षों के बीच संघर्ष हो रहा है, उसमें एक पक्ष को (दूसरे पर दबाव बनाने के लिए) कुछ न कुछ करते रहना पड़ता है. या दोनों पक्ष म्यूचुअली बैठ कर कुछ समझौता करें. बातचीत के लिए किसान नेता तैयार तो हैं लेकिन बातचीत कैसे, कब और कौन करेगा यह एक महत्वपूर्ण बात है. अगर हम लोग आगे जाकर बातचीत करेंगे तो उससे हमारी कमजोरी नजर आएगी. इसलिए हमारा यह कहना है कि हम अपने आंदोलन को बनाए रखें, स्थिर रखें और बढ़ाएं, और तीव्र करें और विशाल करें ताकि सरकार हमें बातचीत के लिए कोई ऑफर दे और फिर उस पर बातचीत हो और किसी समझौते तक पहुंचा जाए.

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सरकार के डेढ़ साल तक कानून रद्द करने के ऑफर पर क्या किसान नेता विचार कर रहे हैं?

जब किसानों के संगठन पंजाब से चले थे तब हमने तय कर लिया था कि हम तीन कानूनों को रद्द करने के लिए इक्क्ठा हुए हैं, इन्हें रद्द करने के लिए ही सरकार से बातचीत करने जा रहे हैं. अगर तीन कानूनों को रद्द करने पर सरकार नहीं मानती है तो हम बातचीत नहीं करेंगे. इसके बाद जब हमने सात नवंबर को पूरे देश के किसान संगठनों के साथ मिलकर (दिल्ली स्थित) गुरुद्वारा रकाबगंज में पहली बार संयुक्त किसान मोर्चा का बैनर लांच किया और बैठक की तो उस दिन भी यही तय हुआ कि हम तीन कानूनों की वापसी, एमएसपी की गारंटी और कुछ अन्य मुद्दों के लिए इकट्ठा हो रहे हैं. इसके बाद जब हम आंदोलन के लिए दिल्ली आये थे. तब भी तमाम संगठनों के प्रतिनिधियों ने यही संकल्प लिया था कि हम तीन कानूनों रद्द करने के लिए दिल्ली आये हैं और इन्हें रद्द करवाने के बाद ही यहां से जाएंगे… सभी किसान नेता और संगठन अभी भी इसी संकल्प पर कायम हैं… किसान नेता कानूनों की पूर्ण वापसी ही चाहते हैं, इसलिए मोदी सरकार के डेढ़ साल तक कानून रद्द करने वाले ऑफर पर कोई विचार नहीं हो रहा है.

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क्या बीच के किसी और रास्ते पर किसान नेता आपस में बात कर रहे हैं?

बीच के रास्ते की बात इस पर निर्भर करती है कि क्या आंदोलन को लंबा चलाया जा सकता है. मैं दर्शनपाल सिंह, संयुक्त किसान मोर्चे का प्रतिनिधि होने के नाते यह कह सकता हूं कि हम इस आंदोलन को लंबा चला सकते हैं, बशर्ते सभी किसान संगठनों के बीच एकता बनी रहे… बशर्ते शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं क्योंकि सभी संगठन तीन महीने पहले ही जुड़े हैं. ऐसे में मैं मानता हूं कि एकता बनाये रखना कोई आसान काम नहीं है. इसमें काफी समय लगा और आगे भी लगेगा. देखिये हमारे पंजाब के साथियों को लंबे संघर्ष चलाने का तरीका आता है और पंजाब के संगठन अगर जुटे रहे तो हम और भी लंबा और भी दमदार आंदोलन चला सकते हैं. इसलिए किसान नेताओं के बीच अभी बीच का रास्ता निकालने जैसी सोच नहीं है. लेकिन फिर भी (सरकार की ओर से) एमएसपी को लेकर कोई बहुत अच्छी बात कही जाती है या फिर कानूनों को लेकर कोई अच्छा विकल्प मिलता है तो उस पर विचार जरूर करेंगे.

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फसल की कटाई के दौरान आंदोलन कैसे चलाएंगे?

देखिये ऐसी परस्थितियों का सामना हमें पंजाब में कई संघर्षों के दौरान करना पड़ा है. इसका हमें तजुर्बा है. दूसरा यह (किसान) आंदोलन तो अब पंजाब के किसानों का नहीं रहा बल्कि एक जनांदोलन बन चुका है. (जनांदोलन बनने की वजह से) अब इस आंदोलन में मान लीजिये करीब 25 से 30 फीसदी ही ऐसे किसान होंगे जो कटाई के समय खेतों में काम में लगते हैं. यानी इनके जाने के बाद भी एक बड़ी तादाद आंदोलन से जुड़ी रहेगी. इसके अलावा (फसल की कटाई के समय) एक व्यवस्था के तहत हम काम करेंगे जिसमें मान लीजिये किसी हफ्ते पंजाब की सभी महिलाओं को आंदोलन में बुला लेंगे, किसी हफ्ते रिटायर्ड कर्मचारियों को बुला लेंगे. इससे फसल की कटाई के समय भी आंदोलन अपने पांव जमाकर रखेगा और जनांदोलन की जो बुनियाद बनी हुई है इस पर इमारत और मजबूत होगी और कभी हिलेगी नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार अजित अंजुम द्वारा लिए गए इस वीडियो साक्षात्कार के संपादित अंश

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