योगेंद्र यादव किसान आंदोलन

विचार-रिपोर्ट | किसान

किसान आंदोलन के पीछे राजनीति की कितनी बड़ी भूमिका है?

किसान आंदोलन पर लगाये जा रहे तमाम आरोपों पर योगेंद्र यादव के जवाब

ब्यूरो | 16 दिसंबर 2020 | फोटो : योगेंद्र यादव/फेसबुक

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क्या किसान नेता पहले से ज्यादा कड़ा रुख अपनाते जा रहे हैं और बीच के रास्ते लिए तैयार नहीं हो रहे?

किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं का रुख अब भी वही है, जो तीन महीने पहले था. वे आज भी शांति से यही कह रहे हैं कि उन्हें तीनों नए कृषि कानून निरस्त करवाने हैं, फिर अब वे बीच का रास्ता क्यों चुनें? इसे लेकर सरकार ने भ्रम फैलाया. कहा गया कि आंदोलनकारी किसान बीच का रास्ता निकालने को तैयार हैं और इन्हें सिर्फ नए कृषि कानून में थोड़े से संशोधन चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से बिना बात किये कानून बना दिया और कहा कि ये उनके लिए ऐतिहासिक सौगात है. किसानों का तो हाथ जोड़कर ये कहना है कि उन्हें यह सौगात नहीं चाहिए. लेकिन सरकार फिर भी उन्हें ये जबरदस्ती दे रही है. इस समय किसान केवल फसल के समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी चाहता है, जो उसे नहीं दी जा रही. देखा जाए तो सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है, किसान ने नहीं. किसान जो चाहते हैं, वह उन्हें नहीं दिया जा रहा और जो वो वे नहीं चाहते, वह उन पर थोपा जा रहा है.

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सरकार जल्द नहीं मानी तो इतना बड़ा आंदोलन कैसे जारी रहेगा?

किसान आंदोलन के दिल्ली आने से पहले यह आंदोलन दो महीने तक पंजाब में चला. इतनी शांति से चला कि किसी वाहन को खरोंच तक नहीं आयी. यह सब शांति के संकल्प के साथ हुआ. दिल्ली आने के बाद से आंदोलन में शामिल सभी किसान संगठनों ने यह संकल्प दोहराया है कि शांतिपूर्ण विरोध ही उनकी ताकत है. अहिंसा मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम है. आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से आगे जारी रहेगा. दूसरी बात यह है कि हरियाणा और पंजाब के किसान दिल्ली पूरी तैयारी के साथ आए हैं. वे अपने ट्रैक्टर-ट्रॉली में काफी समान लेकर आये हैं जिससे आंदोलन लंबे समय तक चलाया जा सके.

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आंदोलन में अडानी और अंबानी का विरोध क्यों हो रहा है?

सोचने वाली बात है, जब किसानों के लिए कानून लाया गया है और किसान ही उसके लिए तैयार नहीं हैं तो फिर सरकार कानून लाने पर अड़ी क्यों है? जाहिर है यह किसी तीसरे को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है. अडानी और अंबानी का नाम इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि इस समय ये दोनों देश के सबसे बड़े कृषि व्यवसायी हैं. सरकार नए कृषि कानून इन्हें फायदा पहुंचाने के लिए ही लायी है. उद्योगपति ज्यादा से ज्यादा भण्डारण कर सकें, इसके चलते भण्डारण करने की सीमा हटाई जा रही है. आज देश में सबसे ज्यादा भण्डारण करने की क्षमता अडानी की कम्पनी के पास है, पंजाब में अडानी ने बहुत बड़ा गोदाम बनाया है, हरियाणा में बनने वाला है. आज देश में कौन कॉन्ट्रैक्ट के जरिये हजारों हेक्टेयर जमीन पर खेती करना चाहता है जिससे कि उसके फल और सब्जियों के रिटेल के बिजनेस को ज्यादा फायदा हो. आज अंबानी के पास देश की सबसे बड़ी रिटेल चैन है. इसके अलावा ये दो नाम इसलिए भी लिए जा रहे हैं क्योंकि ये इस समय प्रतीक हैं, जैसे एक समय टाटा और बिड़ला हुआ करते थे.

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क्या आंदोलन करने वाले किसान संगठनों में फूट पड़ रही है?

इस तरह की बातें उस दिन चर्चा में आयी थीं जब किसान नेता गृहमंत्री अमित शाह से मिलने गए थे. उस बैठक से पहले तक तीस किसान नेता बैठक करने जाते थे, लेकिन उसमें केवल 13 लोग ही गए. ये बात कुछ किसान नेताओं को उस समय पसंद नहीं आयी, तो उन्होंने इस पर आपत्ति जतायी थी. इसके बाद आंदोलन में शामिल सभी किसान नेताओं ने आपस में बैठकर बातचीत की. अब मसला हल हो चुका है. जो लोग उस समय कुछ नाराज थे, उन्होंने खुद कहा है कि आगे से सभी किसान नेता मिलकर जो फैसला लेंगे, वह उन्हें सौ फीसदी स्वीकार्य होगा. इसलिए अब ये मुद्दा नही है और सरकार की इस तरह की (फूट डालने की) कोशिशें सफल नहीं होंगी.

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क्या यह आंदोलन राजनीति से प्रेरित है?

भाजपा पहले दिन से किसान आंदोलन को लेकर कई तरह के आरोप लगा रही है. उसके पास कोई तर्क नहीं है, इसलिए वह किसान आंदोलन को चीन, पाकिस्तान, खालिस्तान से संचालित बता रही है. अब उसने किसान आंदोलन को विपक्षी पार्टियों से संचालित बताया है. बीते हफ्ते आंदोलनकारी किसान नेताओं ने भारत बंद को सफल बनाने के लिए देश के सभी संगठनों से सहयोग की अपील थी, कई पार्टियों ने उसमें सहयोग किया. किसान आंदोलन को राजनीतिक पार्टियों का समर्थन जरूर मिला है, लेकिन इसका संचालन केवल किसान संगठन ही कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि राजनीतिक पार्टियों के पास आंदोलन को समर्थन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. हर कोई जानता है कि इतना बड़ा आंदोलन करना इस समय विपक्ष के बूते की बात नहीं है. अगर कांग्रेस लाखों किसानों को लाकर दिल्ली में इतना बड़ा आंदोलन करवा सकती, तो आज वह 50 सांसदों के साथ लोकसभा में न बैठी होती.

(द क्विंट हिंदी और अंग्रेज़ी द्वारा पोस्ट किये गये योगेंद्र यादव के वीडियो साक्षात्कारों से लिया गया)

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