अजीत सिंह और राकेश टिकैत

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

क्या किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को फिर से बदलने जा रहा है?

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जो राजनीतिक समीकरण पूरी तरह भाजपा के पक्ष में थे, वे अब बदलते दिख रहे हैं

अभय शर्मा | 09 फरवरी 2021 | फोटो: फेसबुक/राकेश टिकैत

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जब राकेश टिकैत गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे थे

बीते 26 नवंबर को हरियाणा और पंजाब के किसानों ने नए कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली के लिए कूच किया था. इन किसानों ने दिल्ली के टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ डेरा जमा लिया. इसके बाद उत्तर प्रदेश में किसानों के संगठन – भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) – ने भी सक्रियता दिखाई और प्रदर्शन कर रहे कई किसान संगठनों के संयुक्त संगठन – संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल हो गया. इसके बाद भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कुछ किसानों के साथ दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा – गाजीपुर बॉर्डर – पर नए कानून की वापसी की मांग के साथ आंदोलन शुरू कर दिया. शुरुआत में राकेश टिकैत के साथ केवल भाकियू के मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़, शामली, बाग़पत जिलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता ही थे. आंदोलन के शुरूआती दो महीनों तक सबसे ज्यादा चर्चा टिकरी और सिंघु बॉर्डर की होती थी क्योंकि एक तो इन जगहों पर दर्जन भर से ज्यादा किसानों के नेता आंदोलन चला रहे थे, दूसरा यहां आंदोलनकारियों की संख्या भी गाजीपुर बॉर्डर की तुलना में बहुत ज्यादा थी. कुछ जानकारों की मानें तो गाजीपुर को मीडिया या आम लोग इसलिए भी ज्यादा तरजीह नहीं दे रहे थे क्योंकि आंदोलन कर रहे सभी किसान नेताओं में राकेश टिकैत ऐसे दिख रहे थे जिन्हें सरकार आसानी से मना सकती थी. बीते सालों में हुए कुछ आंदोलनों में ऐसा हो भी चुका था.

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कैसे राकेश टिकैत किसान आंदोलन के सबसे बड़े नेता बन गए

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा ने जनता के एक बड़े तबके में आंदोलकारी किसानों के प्रति सहानुभूति कम या खत्म कर दी थी. इसके बाद किसान नेताओं और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई की मांग उठने लगी. तब माना जाने लगा था कि पुलिस किसी भी समय कार्रवाई करके टिकरी, सिंघु और गाजीपुर बॉर्डर पर डटे किसानों को हटा सकती है. इस आशंका के चलते दो महीने से आंदोलन कर रहे कई किसान अपने घर वापस लौटने लगे थे. इसी बीच चार किसान संगठनों ने अपना आंदोलन वापस लेने की घोषणा भी कर दी. किसान नेताओं में एकजुटता की कमी के चलते आंदोलन खत्म होता दिख रहा था. लेकिन 28 जनवरी की शाम को राकेश टिकैत ने आरोप लगाया कि गाजीपुर बॉर्डर पर धरना दे रहे लोगों की बिजली और पानी की सप्लाई काट दी गई है. मीडिया से बात करते वक्त टिकैत इतने भावुक हो गए कि रोने लगे और अपनी जान देने तक की धमकी दे डाली. दो रोज पहले तक जिन राकेश टिकैत को किसान आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी कहा जा रहा था, 28 जनवरी को न सिर्फ उनके आंसुओं ने किसान आंदोलन को खत्म होने से बचा लिया बल्कि उसमें नई जान भी फूंक दी. देश के बड़े किसान नेता रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत के बयान का असर हरियाणाा और पश्चिमी यूपी में कुछ घंटों बाद ही दिखने लगा और भारी संख्या में हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान गाजीपुर बॉर्डर पहुंचने लगे. इसके बाद कई इलाकों में राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत ने महापंचायतें कीं जिनमें लाखों लोग इकट्ठा हुए. जानकारों की मानें तो राकेश टिकैत के आसुओं के चलते अब यह आंदोलन किसानों, खासकर जाटों के लिए उनकी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान नेताओं की क्या भूमिका रही है?

अगर बीते छह सालों को छोड़ दें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश कभी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गढ़ नहीं रहा. इसकी सबसे बड़ी वजह यहां के किसानों की एकता को माना जाता है. यहां जाट और मुस्लिम समुदाय, दोनों से ही आने वाले लोग अपने आप को सबसे पहले एक किसान के तौर पर देखते थे. इनकी एकता की एक वजह किसान नेता और भाकियू के संस्थापक महेंद्र सिंह टिकैत भी थे, जो इसी क्षेत्र से आते थे. टिकैत के चलते यहां के जाट और मुस्लिम किसान मिल-जुलकर रहते थे क्योंकि किसान आंदोलनों में दोनों एक साथ हिस्सा लिया करते थे. साथ ही टिकैट की भारतीय किसान यूनियन में मुस्लिम समुदाय के कई लोग महत्वपूर्ण पदों पर भी थे. हालांकि, महेंद्र सिंह टिकैत ने कभी भी किसानों पर किसी राजनीतिक दल को समर्थन देने या न देने का दबाव नहीं बनाया, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जाट-मुस्लिम एकता का फायदा चौधरी अजीत सिंह की आरएलडी और अन्य (गैर भाजपाई) दलों को मिला करता था. अजीत सिंह को ज्यादा फायदा इसलिए भी मिलता था क्योंकि वे जाट नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे थे और इस कारण किसानों को उनसे खास लगाव था.

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2013 के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हमेशा से जो राजनीतिक समीकरण बने हुए थे, वे 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बदल गए. इन दंगों के चलते मुस्लिम और जाट एकता पूरी तरह तहस-नहस हो गयी और मुस्लिम समुदाय के लोग जाटों के साथ-साथ किसान यूनियन और उसके नेताओं नरेश और राकेश टिकैत से भी खासे नाराज हो गए. इसकी वजह यह थी कि मुजफ्फरनगर में हिन्दू-मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ने के बाद भारतीय किसान यूनियन ने एक महापंचायत का आयोजन किया था. इस महापंचायत में ही भाजपा नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए थे और इसी पंचायत के समाप्त होने पर पूरे जिले में दंगा भड़क गया था जिसमें 43 लोगों की मौत हुई थी. दंगों के बाद टिकैत भाइयों से नाराज होकर भाकियू के कई मुस्लिम नेताओं ने संगठन छोड़ दिया था. इनमें भाकियू के संस्थापक सदस्य और महेंद्र सिंह टिकैत के बेहद करीबी रहे गुलाम मोहम्मद जौला भी शामिल थे. इन दंगों के बाद टूटी जाट-मुस्लिम एकता का सीधा फायदा भाजपा को हुआ. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुल 44 विधानसभा सीटें हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में 41 फ़ीसदी वोट मिला था, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे औसत से ज़्यादा 43-44 फ़ीसदी वोट मिला. 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिला था, लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 52 था. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा को जहां 42 फ़ीसदी वोट मिला था, वहीं राज्य के जाट बहुल इलाके में उसे 50 फ़ीसदी वोट हासिल हुआ था.

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किसान आंदोलन ने फिर राजनीतिक समीकरण बदल दिए

हाल ही में किसान आंदोलन और राकेश टिकैत के समर्थन में जिन भी क्षेत्रों में महापंचायतें हुई हैं, वहां जाटों के साथ-साथ मुस्लिम किसानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है. बीती 29 जनवरी को मुजफ्फरनगर में किसान आंदोलन को लेकर जो महापंचायत नरेश टिकैत ने बुलाई थी, उसमें गुलाम मोहम्मद जौला भी शामिल हुए और उन्होंने दोनों समुदायों से एक बार फिर साथ-साथ चलने की अपील की. महापंचायत में जौला की ही बात को आगे बढ़ाते हुए नरेश टिकैत ने कहा, ‘2013 में दंगा करा कर बीजेपी ने अपना उल्लू सीधा कर लिया. किसी का भी विश्वास किया जा सकता है लेकिन बीजेपी का नहीं करना चाहिए… चौधरी अजीत सिंह को हराकर हमने बड़ी भूल कर दी, इसमें हम भी दोषी हैं. चौधरी चरण सिंह कलयुग के अवतार थे. अजित सिंह को हराने पर हमें पछतावा है आगे ऐसी गलती नहीं करेंगे…’ किसान आंदोलन को लेकर हो रही इन महापंचायतों में अजीत सिंह के बेटे और आरएलडी उपाध्यक्ष जयंत चौधरी भी शामिल हो रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को काफी करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनुराग शुक्ला कहते हैं, ‘अभी तक राकेश और नरेश टिकैत का भाजपा को समर्थन था, इसी वजह से अजीत सिंह को जाटों का पूरा समर्थन 2019 के चुनावों में भी नहीं मिल सका और वे बहुत कम वोटों के अंतर से हार गए, लेकिन अब ऐसा लगता है कि जाटों का भाजपा से मोहभंग हो गया है.’ अगर सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए तो भी क्या किसान भाजपा से दूर चला जाएगा? इस सवाल पर अनुराग कहते हैं, ‘विधानसभा चुनाव में अभी समय है इसलिए कुछ कहना जल्दबाजी होगा, लेकिन किसान आंदोलन ने 2013 के बाद पहली बार जाट और मुसलमानों को एक साथ ला दिया है तो इस तालमेल का पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर असर तो जरूर पड़ेगा.’ कुछ स्थानीय पत्रकार यह भी बताते हैं कि नया कृषि कानून वापस हो या न हो, लेकिन इस आंदोलन ने राकेश टिकैत को महेंद्र सिंह टिकैत के स्तर का नेता बना दिया है. इन लोगों के मुताबिक राकेश टिकैत राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी रखते हैं और दो बार चुनाव भी लड़ चुके हैं. ऐसे में आगे उनके रुख पर भी जाट बहुल इलाकों की राजनीति निर्भर करेगी.

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