किरण बेदी

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

जब किरण बेदी पुडुचेरी में कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी बनी हुई थीं तो उन्हें हटाया क्यों गया?

पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी को ऐसे समय हटाया गया है जब राज्य में दो महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने हैं

अभय शर्मा | 19 फरवरी 2021 | फोटो : पीआईबी

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क्या हुआ है?

बीते मंगलवार की रात को अचानक पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी को उनके पद से हटा दिया गया. राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी की गई विज्ञप्ति में कहा गया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने निर्देश दिया है कि किरण बेदी अब पुडुचेरी की उपराज्यपाल नहीं रहेंगी. उनकीे जगह तेलंगाना की राज्यपाल तमिलसाई सौंदरराजन को पुडुचेरी के उपराज्यपाल पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है. अगली सुबह ही किरण बेदी ने इस संबंध में एक पत्र ट्विटर पर साझा किया. इसमें उन्होंने लिखा, ‘पुडुचेरी के उपराज्यपाल के तौर पर काम करने का मौका देने के लिए मैं भारत सरकार की आभारी हूं. मैं उन सबका भी आभार जताती हूं, जिन्होंने मेरे साथ काम किया. मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूं कि मेरे इस कार्यकाल के दौरान राजनिवास टीम ने पूरी लगन से जनहित के लिए काम किया है. अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए मैंने जो कुछ भी किया वह मेरा पवित्र कर्त्तव्य था. पुडुचेरी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. यह अब लोगों के हाथ में है. एक समृद्ध पुडुचेरी की कामना करती हूं…’

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किरण बेदी और पुडुचेरी की सरकार के बीच रिश्ते

पुडुचेरी की उपराज्यपाल और वहां के मुख्यमंत्री वी नारायणसामी के बीच के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. अपने साढ़े चार साल से ज्यादा के कार्यकाल में मुख्यमंत्री यही आरोप लगाते रहे कि उपराज्यपाल उनके रोजमर्रा के काम में अनुचित दखल देती हैं. स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक सरकार के कामकाज में बेदी का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया था कि वे सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी द्वारा चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को भी उसे पूरा नहीं करने दे रही थीं. फरवरी 2019 में तो दोनों को झगड़ा इतना बढ़ गया था कि मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्य छह दिनों तक राजभवन के सामने धरने पर बैठे रहे. उस समय किरण बेदी, सरकार की ओर से पारित 39 प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दे रही थीं. इनमें समाज के कुछ खास वर्गों के लिए दीवाली और पोंगल पर मुफ़्त अनाज और उपहार बांटने जैसी योजनाएं शामिल थीं. हालांकि, इसके कुछ रोज बाद नारायणसामी सरकार के कुछ प्रस्तावों को उपराज्यपाल ने हरी झंडी दे दी लेकिन फिर भी आए दिन दोनों के बीच तनाव की खबरें आती रहती थीं. बीते महीने भी नारायणसामी कुछ दिनों तक राजभवन के सामने धरने पर बैठे रहे और इसके बाद उन्होंने इस संबंध में दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात भी की थी. इससे पहले भी कई बार नारायणसामी किरण बेदी की सरकारी कामकाज में दखलंदाजी को लेकर गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मुलाकात कर चुके थे.

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बीते एक महीने से पुडुचेरी में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल

बीते एक महीने से पुडुचेरी की राजनीति में वैसी ही उथल-पुथल मची हुई है जैसी हाल ही में कर्नाटक, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में देखने को मिली थी. बीती 25 जनवरी को राज्य में कांग्रेस के दो विधायकों – ए नमासिव्यम और ई थीपप्पंजन – ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया और पार्टी छोड़ दी. कांग्रेस छोड़ने के बाद इन दोनों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया. ए नमासिव्यम का भाजपा के साथ जाना कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि वे पुडुचेरी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं और उन्होंने राज्या में पार्टी के आधार मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी. कांग्रेस इन झटकों से उबर ही रही थी कि बीते सोमवार को मुख्यमंत्री नारायणसामी के बेहद करीबी और राज्य सरकार में मंत्री मल्लादि कृष्ण राव ने भी अपने पद और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. इसके अगले ही दिन एक और कांग्रेस विधायक जॉन कुमार ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद मुख्यमंत्री नारायणसामी ने भाजपा पर पुडुचेरी में भी ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाने का आरोप लगाया. उन्होंने एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘भाजपा हमारी पार्टी के विधायकों की खरीद-फरोख्त में लगी है, और वह अन्य राज्यों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को गिराने के लिए इस्तेमाल की गई रणनीति को दोहरा रही है. लेकिन जनता जानती है. लोग कह रहे हैं कि यह विधायक और वो मंत्री खरीदा गया है.’ उधर, कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले थीपप्पंजन का कहना था कि कांग्रेस के कई और विधायक और नेता भी जल्द पार्टी छोड़ने वाले हैं.

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क्यों भाजपा पुडुचेरी में ‘ऑपरेशन लोटस’ नहीं चलाना चाहेगी

33 सदस्यों वाली पुड्डुचेरी विधानसभा में 30 सीटों के लिए चुनाव होते हैं और तीन सदस्य मनोनीत होते हैं. राज्य में पांच साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 15 विधायक जीते थे और उसने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के तीन और एक निर्दलीय विधायक की मदद से सरकार बनाई थी. कांग्रेस के एक विधायक एन धनावेलु को पिछले साल कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते सदन की अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी थी. और अब पार्टी के चार विधायकों ने अपना इस्तीफा दे दिया है. यानी सरकार के पास इस वक्त सिर्फ 14 विधायकों का समर्थन ही बचा है. उधर, अगर भाजपा की बात करें तो पुडुचेरी में उसका एक भी विधायक नहीं है, हालांकि एआईएडीएमके के चार और आल इंडिया एनआर कांग्रेस (एआईएनआरसी) के सात विधायक उसके पक्ष में हैं. ऐसे में, जानकारों के मुताबिक, भाजपा वहां की कांग्रेस सरकार को नहीं गिराना चाहेगी क्योंकि ऐसा करने से उसे मिलना कुछ नहीं है और छवि खराब होने का खतरा पूरा है. पुडुचेरी में भाजपा के जनाधार की बात करें तो बीते विधानसभा चुनाव में उसने यहां की सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इनमें से 22 सीटों पर उसे ‘नोटा’ से भी कम वोट मिले थे और दो सीटों पर तो उसके उम्मीदवार 100 वोट भी नहीं पा सके थे. भाजपा अभी इसलिए भी पुडुचेरी में ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाने से पहले 10 बार सोचेगी क्योंकि यहां पर दो महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में हो सकता है कि वी नारायणसामी की सरकार गिराने से कांग्रेस को मतदाताओं की सहानुभूति मिल जाए.

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इस सब के बीच अचानक किरण बेदी को क्यों हटाया गया?

जानकारों की मानें तो हो सकता है कि पुडुचेरी में अल्पमत में आ चुकी कांग्रेस की सरकार अगले कुछ दिनों में गिर जाए. लेकिन कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के पीछे ‘ऑपरेशन लोटस’ के बजाय वह रणनीति है जिसे भाजपा ने विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर-पूर्वी राज्यों में अपनाया था. इसके तहत जहां भाजपा की अपनी जमीन मजबूत नहीं होती है, वहां वह चुनावों से कुछ महीनों पहले दूसरी पार्टी के नेताओं को अपने खेमे में खींच लेती है. दक्षिण भारत में इस साल अप्रैल-मई में पुडुचेरी के साथ-साथ तमिलनाडु और केरल में भी चुनाव होने हैं, भाजपा को तमिलनाडु और केरल में ज्यादा कुछ मिलता नजर नहीं आ रहा, लेकिन पुडुचेरी में उसे कांग्रेस को कमजोर करके एक बेहतर मौका दिख रहा है. भाजपा के सूत्रों की मानें तो पार्टी ने पुडुचेरी जैसे छोटे राज्य के लिए भी पूरी तरह से कमर कस ली है, और उसने अपने दो बड़े नेताओं – केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और राजीव चंद्रशेखर – वहां के विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी है. भाजपा से जुड़े कुछ सूत्र यह भी बताते हैं कि किरण बेदी को भी उपराज्यपाल के पद से आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए ही हटाया गया है. दरअसल, किरण बेदी की दखलंदाजी को नारायणसामी मोदी सरकार की साजिश बता रहे थे. वे यह कहते आ रहे थे कि मोदी सरकार बेदी के जरिये उनकी सरकार को काम करने और चुनावी वादे पूरा करने से रोक रही है. कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा ही इसी को बनाना चाहती थी. पुडुचेरी के अख़बारों में भी आए दिन उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के झगड़े की खबरें छपने के चलते जनता के बीच यह मुद्दा ठंडा नहीं पड़ रहा था. भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो इसे चुनावी मुद्दा बनने से रोकने के लिए ही चुनाव से दो महीने पहले किरण बेदी को हटा दिया गया है. गौर करने वाली बात यह भी है कि मोदी सरकार ने बेदी का ट्रांसफर नहीं किया है, बल्कि उन्हें रातों-रात हटा दिया है. माना जा रहा है कि ऐसा करके भाजपा ने पुडुचेरी के लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसे भी किरण बेदी का काम करने का तरीका पसंद नहीं था.

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