किमची

विचार-रिपोर्ट | विदेश

चीन और दक्षिण कोरिया एक डिश के पीछे क्यों झगड़ रहे हैं?

कोरियाई डिश किमची को लेकर एक बार फिर चीन और दक्षिण कोरिया के बीच तनातनी शुरू हो गयी है

अभय शर्मा | 08 दिसंबर 2020 | फोटो: क्लीवलैंड क्लीनिक

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झगड़े की जड़

बीते हफ्ते स्विट्जरलैंड स्थित अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) ने चीनी डिश (अचार) पाओ काई को लेकर नया प्रमाण पत्र जारी किया. चीन के सिचुआन प्रांत में स्थित पाओ काई इंडस्ट्री ने पिछले दिनों इसके प्रमाणन के लिए आवेदन दिया था. आईएसओ ने पाओ काई को प्रमाणित करते हुए कहा कि उसके द्वारा जारी किया गया प्रमाण पत्र केवल चीनी पाओ काई पर ही लागू होगा. लेकिन चीन की सरकारी मीडिया एजेंसी ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि कोरियाई डिश किमची के उत्पादन को लेकर चीन ने अंतरराष्ट्रीय प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेशन) हासिल कर लिया है और अब इस डिश पर चीन का अधिकार है. किमची दक्षिण कोरिया का राष्ट्रीय व्यंजन है जो चीनी पाओ काई से काफी मिलता-जुलता है. इस रिपोर्ट के बाद चीन और दक्षिण कोरिया के बीच झगड़ा शुरू हो गया.

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कोरिया की प्रतिक्रिया

ग्लोबल टाइम्स की खबर पर दक्षिण कोरिया के लोगों ने सोशल मीडिया के जरिये जमकर विरोध जताया. कोरियाई सरकार ने भी आधिकारिक रूप से इस खबर का खंडन किया. कोरियाई कृषि मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, ‘चीन के सरकारी मीडिया की तरफ से गलत खबर प्रसारित की जा रही है. किमची को लेकर संयुक्त राष्ट्र 2001 में ही अंतरराष्ट्रीय मानक निर्धारित कर चुका है. इसलिए यह खबर झूठी है कि चीन ने किमची का अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) हासिल कर लिया है.’ दक्षिण कोरिया के कृषि मंत्रालय का यह भी कहना था, ‘हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि हालिया प्रमाणन चीनी पाओ काई के लिए हैं, न कि कोरियाई किमची के लिए. चीनी मीडिया को अपनी रिपोर्ट्स में यह अंतर बताना चाहिए था.’

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किमची बनता कैसे है?

किमची को कई क्षेत्रों में जिमची भी कहा जाता है. यह एक तरह का खट्टा-मीठा और हल्का तीखा अचार है, जिसे तरह-तरह की हरी एवं रंगीन बंदगोभियों, हरी पत्तियों वाले साग और मूली पर हल्का खमीर चढ़ाकर बनाया जाता है. यह कुछ-कुछ वैसे ही बनता है, जैसे पंजाब में गाजर की कांजी बनाई जाती है. किमची को स्वादिष्ट बनाने और खराब होने से बचाने के लिए इसमें नमक, मिर्च तथा कुदरती रूप से नमकीन समुद्री जीवों का इस्तेमाल किया जाता है. अचार की ही तरह किमची को बड़े-बड़े मर्तबानों में रखा जाता है. कोरिया के कुछ हिस्सों में जब कड़ाके की ठंड पड़ती है और ताजी सब्जियों की किल्लत हो जाती है, तब किमची वहां के लोगों का मुख्य व्यंजन बन जाती है. इसे छोटी-सी तश्तरी में मुख्य भोजन परोसने से पहले मेज पर रख दिया जाता है और लोग इसे चॉपस्टिक से उठा-उठाकर खाते हैं. किमची को नूडल और चावल के साथ विशेष तौर पर खाया जाता है.

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दक्षिण कोरिया की पहचान

दक्षिण कोरियाई लोग किमची को अपनी सांस्कृतिक विरासत की तरह देखते हैं. वे पॉप म्यूजिक और सोप ओपेरा की तरह किमची को भी अपनी प्रतिष्ठा और पहचान से जोड़ते हैं. कोरिया की सरकार ने इसे दुनिया भर में प्रचलित करने के लिए 2001 में इसके अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित करवाए. 2013 में यूनेस्को ने किमची को दक्षिण कोरिया का बताते हुए इसे बनाने की प्रक्रिया – किमजेंग – को सांस्कृतिक विरासत की श्रेणी में शामिल किया. दक्षिण कोरिया की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय किमची संस्थान और किमची से जुड़े एक रिसर्च केंद्र – कोरियाई किमची एसोसिएशन – की भी स्थापना की. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय फूड रिसर्च संस्थान ने लम्बे समय तक किमची के औषधीय गुणों पर रिसर्च किया. उसका मानना है कि किमची शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाकर उसे अनेक संक्रामक रोगों से बचाता है. राजधानी सियोल में किम्चिकान नामक एक संग्रहालय भी है, जो इस व्यंजन के 1,500 साल के इतिहास और इसकी लगभग 180 किस्मों की जानकारी देता है. इतिहासकार भी किमची को कोरिया से ही जुड़ा बताते हैं. इनके मुताबिक किमची का उल्लेख ईसा पूर्व पहली सदी के कोरियाई साहित्य में भी मिलता है. विद्वानों ने किमची शब्द का मूल भी प्राचीन कोरियाई भाषा में ही तलाशा है.

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चीन किमची पर दावा क्यों करता है?

चीन के किमची पर दावा करने के पीछे की एक मात्र वजह ‘किमची का व्यापार’ है. अपने आस-पास के देशों से लेकर अमेरिका और यूरोप तक किमची का सबसे बड़ा निर्यातक चीन है. आईएमएफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण कोरिया तक अपने यहां किमची की मांग को पूरा करने के लिए चीन से इसे आयात करता है. विश्व किमची संस्थान की 2017 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण कोरिया के होटल और रेस्तरां 90 फीसदी तक किमची चीन से ही मंगवाते हैं. इसकी वजह चीनी किमची का सस्ता होना है. इन वजहों से चीन पिछले कई सालों से लगातार यह कह रहा है कि इस व्यंजन पर केवल उसका ही अधिकार है. और इसका प्रमाणन उसके नाम पर ही दर्ज होना चाहिए.

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