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विचार-रिपोर्ट | राजनीति

नेमोम को केरल में ‘भाजपा का गुजरात’ क्यों कहते हैं?

केरल के ज्यादातर इलाकों में भाजपा का जनाधार न के बराबर है, लेकिन यहां का 'नेमोम' विधानसभा क्षेत्र इस मामले में बिलकुल अलग है

अभय शर्मा | 23 मार्च 2021 | फोटो : राज्यसभा टीवी

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नेमोम को लेकर इतनी चर्चा क्यों?

केरल की ‘नेमोम’ विधानसभा सीट राज्य की सबसे हॉट और चर्चित सीट बन गई है. यह एक ऐसी सीट है जिस पर उम्मीदवार के चयन को लेकर कांग्रेस को काफी माथापच्ची करनी पड़ी है. पहले खबरें आयीं कि कांग्रेस राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी को इस सीट से चुनाव लड़वाएगी. इसके बाद विधानसभा में नेता विपक्ष रमेश चेन्नीथाला के नाम की चर्चा हुई. फिर उम्मीदवारों की सूची जारी होने से एक दिन पहले खबरें आयीं कि राहुल गांधी चाहते हैं कि शशि थरूर इस सीट से चुनाव लड़ें क्योंकि यह सीट उनके ही लोकसभा क्षेत्र तिरुवनंतपुरम में आती है. लेकिन, जब सूची आयी तो उसमें इन तीनों नेताओं के बजाय कांग्रेस के दिग्गज नेता के मुरलीधरन का नाम था. केरल के पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण के बेटे मुरलीधरन चार बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं. वे वर्तमान में भी सांसद हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने नेमोम सीट जीत कर राज्य में पहली बार किसी विधानसभा सीट पर कब्जा जमाया था. कांग्रेस से जुड़े नेताओं की मानें तो पार्टी हाईकमान चाहता है कि इस बार भाजपा से यह सीट भी छीन ली जाए और इसीलिए इस सीट पर उम्मीदवार के चयन में ज्यादा समय लगा.

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केरल में ‘भाजपा का गुजरात’

नेमोम से पिछला यानी 2016 का विधानसभा चुनाव भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ओलनचेरी राजगोपाल ने जीता था. लेकिन अब उनकी उम्र 93 वर्ष होने के चलते उन्होंने चुनाव मैदान में न उतरने का फैसला किया है. चूंकि भाजपा इस सीट को दोबारा जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है इसलिए उसने इस बार मिजोरम के पूर्व राज्यपाल और केरल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कुमनम राजशेखरन को नेमोम से टिकट दिया है. केरल में भाजपा का जनाधार बहुत कम है, लेकिन यहां नेमोम एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जहां भाजपा की स्थिति इतनी बेहतर मानी जाती है कि भाजपा नेताओं से लेकर कुछ राजनीतिक विश्लेषक तक इसे केरल में ‘भाजपा का गुजरात’ कहते हैं. नेमोम में भाजपा का हाल के सालों का प्रदर्शन देखें तो 2016 के विधानसभा चुनाव में यहां ओ राजगोपाल को 47 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के शशि थरूर एक लाख से ज्यादा वोटों से तिरुवनंतपुरम सीट से जीते थे. उन्हें तिरुवनंतपुरम में आने वाली हर विधानसभा में अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन नेमोम में वे भाजपा उमीदवार से करीब 12,000 वोटों से पीछे थे. इसी तरह बीते दिसंबर में हुए निकाय चुनाव में भी भाजपा ने नेमोम की कुल 22 सीटों में से 14 पर कब्जा जमाया था.

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नेमोम के वोटर

नेमोम विधानसभा क्षेत्र में कुल वोटरों की संख्या करीब एक लाख 92 हजार है. इनमें 65 फीसदी के आसपास ऊंची जाति के हिंदू वोटर हैं. आंकड़ों के मुताबिक यहां 32,000 वोटर मुसलमान और तकरीबन इतनी ही संख्या ‘नादर’ ईसाईयों की भी है. ऊंची जाति के हिंदुओं की संख्या ज्यादा होने के चलते केरल की तीनों प्रमुख पार्टियों – भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम – ने नेमोम से इस बार जो प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं, वे सभी हिन्दुओं की ऊंची जाति ‘नायर’ से आते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस चुनाव में भाजपा पहले की तरह केवल हिंदू वोटरों पर निर्भर है, जबकि कांग्रेस और सीपीएम हिंदू, ईसाई और मुसलमान तीनों समुदायों के वोट मिलने की आस लगाए हुए हैं. हालांकि, जानकार इस चुनाव में नेमोम में कांग्रेस से ज्यादा सीपीएम का पलड़ा भारी बताते हैं. इनके मुताबिक बीते महीने ही केरल की सीपीएम सरकार ने नादर ईसाईयों को ओबीसी आरक्षण देने का फैसला किया है. इसके चलते नादर समुदाय, जिसे कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है, बड़ी संख्या में सीपीएम की ओर खिसक सकता है.

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भाजपा का विस्तार

नेमोम में 2001 और 2006 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता एन सकथान विजयी हुए थे. तब सीपीएम यहां दूसरे नंबर पर रही थी. इन दो चुनावों में अगर भाजपा का प्रदर्शन देखें तो 2001 में उसे यहां 16,872 और 2006 में 6,705 वोट मिले थे. नेमोम में साल 2006 तक जो भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें मुख्य मुकाबले में कांग्रेस और सीपीएम रहते थे. लेकिन इसके बाद से इस सीट पर मुख्य मुकाबला सीपीएम और भाजपा के बीच होने लगा. यहां से 2011 का चुनाव सीपीएम के उम्मीदवार ने जीता जिन्हें 42.99 फीसदी वोट मिले, इस चुनाव में भाजपा 37 फीसदी वोट पाकर दूसरे नंबर पर रही, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन के प्रत्याशी को 17.38 फीसदी वोट ही मिल सके. इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 47 फीसदी वोट पाकर पहले नंबर आ गयी और सीपीएम का उम्मीदवार 41 फीसदी वोटों के साथ दूसरे नंबर पर. इस चुनाव में यूडीएफ को 10 फीसदी से भी कम वोट मिले थे.

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कांग्रेस कैसे पिछड़ी?

केरल कांग्रेस के अब तक के सबसे बड़े नेता और चार बार के मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने भी नेमोम से चुनाव लड़ा था. करुणाकरण ऊंची जाति के नेता थे जिस वजह से उनका इस क्षेत्र पर खासा प्रभाव था और यहां की बहुसंख्यक हिंदू आबादी उनके चलते ही कांग्रेस को वोट देती थी. 2010 में करुणाकरण का निधन हो गया जिसका प्रभाव नेमोम में कांग्रेस के वोट बैंक पर पड़ा. 2011 में कांग्रेस ने एक और बड़ी गलती यह कर दी कि यह सीट अपने गठबंधन की ऐसी सहयोगी पार्टियों को दे दी जिनका जनाधार इस क्षेत्र में न के बराबर था. केरल के वरिष्ठ पत्रकार अय्यपन आर के मुताबिक कांग्रेस की इस गलती से इस क्षेत्र में भाजपा की ताकत बढ़ने लगी. 2014 में अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने दक्षिण और उत्तर-पूर्व भारत में विस्तार की नीति पर गंभीरता से काम करना शुरू किया. इस नीति के तहत केरल में नेमोम जैसी कुछ सीटों पर विशेष ध्यान दिया गया जिसके चलते भी पार्टी को यहां मजबूती मिली.

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