इमरान खान

विचार-रिपोर्ट | विदेश

क्या कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने से पाकिस्तान को कुछ फायदा हो सकता है?

भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने के फैसले को पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय किया है

अभय शर्मा | 28 अगस्त 2019 | फोटो : पीआईडी

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पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के भारत के फैसले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी आईसीजे में उठाने का फैसला किया है. उसने इससे पहले इस मसले को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था, लेकिन हर जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी. सभी ने इस मामले में दखल देने से इंकार कर दिया. कानून के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान को आईसीजे में भी कोई सफलता हाथ नहीं लगेगी. आईसीजे किसी मामले पर सुनवाई से पहले यह देखता है कि जो मसला उसके पास आया है वह उसके अधिकार क्षेत्र में है भी या नहीं. इसके लिए आईसीजे चार्टर में दो शर्तें रखी गई हैं.

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पहली शर्त के अनुसार यदि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि यह मसला वाकई उनके बीच का विवाद है तो वह आईसीजे के अधिकार क्षेत्र में आता है. इस शर्त के तहत पाकिस्तान आईसीजे से कहेगा कि भारत ने धारा-370 को जम्मू-कश्मीर राज्य से हटाया है, जो वर्षों से दोनों देशों के बीच एक विवादित मसला है. लेकिन पाकिस्तान की इस दलील के जवाब में भारत इसे अपना आंतरिक मामला बताएगा. वह दलील देगा कि धारा-370 हटाना दोनों देशों के बीच का मसला नहीं है क्योंकि यह बदलाव उसने अपने संविधान में किया है. साथ ही इससे पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा में कोई बदलाव नहीं हुआ है. जानकार कहते हैं कि इस तरह आईसीजे की पहली शर्त पर यह मामला खरा नहीं उतरेगा.

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आईसीजे चार्टर की दूसरी शर्त के अनुसार वह मसला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है जिसमें किसी एक देश ने द्विपक्षीय या अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन किया हो. इस शर्त के तहत पाकिस्तान यह कह सकता है कि भारत ने धारा-370 हटाकर 1948 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाये गए कश्मीर प्रस्ताव का उल्लंघन किया है.

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लेकिन जानकारों की मानें तो भारत के पास पाकिस्तान की इस दलील को गलत साबित करने के लिए भी कई तर्क हैं. इनके मुताबिक अनुच्छेद-370 को यूएन में आये कश्मीर प्रस्ताव के कई साल बाद 1954 में भारतीय संविधान में जोड़ा गया था. उस समय यूएन का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं था और यह उसके किसी प्रस्ताव में भी शामिल नहीं है. ऐसे में अब भारत द्वारा इसे एकतरफा हटाने से यूएन के किसी प्रस्ताव का उल्लंघन नहीं होता है.

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जानकार की मानें तो ऐसे में इस मामले पर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से भी वही जवाब मिलेगा जो यूएन से मिला है. यूएन महासचिव एंतोनियो गुतेरेस ने अपने बयान में कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर के अंतिम और शांतिपूर्ण हल के लिए शिमला समझौते के तहत भारत से द्विपक्षीय बातचीत करे.

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