ज्ञानवापी मस्जिद

विचार-रिपोर्ट | समाज

क्या ज्ञानवापी मस्जिद पर आया निचली अदालत का फैसला ऊपरी अदालत में टिका रह सकता है?

वाराणसी की एक अदालत ने एएसआई को यह पता लगाने का आदेश दिया है कि क्या ज्ञानवापी मस्जिद के स्थान पर पहले काशी विश्वनाथ मंदिर था

अभय शर्मा | 16 अप्रैल 2021 | फोटो : विकीमीडिया कॉमन्स

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सिविल कोर्ट ने क्या आदेश दिया है?

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद मामले में वाराणसी की एक अदालत ने मस्जिद परिसर की पुरातात्विक जांच कराने के आदेश जारी किए हैं. इस फास्ट ट्रैक कोर्ट के सिविल जज आशुतोष तिवारी ने अपने आदेश में कहा है कि ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ यानी ‘एएसआई’ अपने ख़र्च पर (परिसर की) खुदाई करे और खुदाई का काम पांच सदस्यीय एक कमेटी के नेतृत्व में किया जाए जिनमें से दो सदस्य मुस्लिम होने चाहिए. जज के मुताबिक ‘विवादित विषय का संबंध हमारे पुराने इतिहास से है’, ऐसे में एएसआई पता लगाए कि वर्तमान में विवादित स्थल पर खड़ा धार्मिक ढांचा, ऊपर रखा गया है, कोई परिवर्तन है, या जोड़ा गया है, या फिर किसी धार्मिक ढांचे के साथ, किसी तरह की ओवरलैपिंग है. यानी पांच सदस्यीय कमेटी को यह पता लगाना है कि मस्जिद बनाए जाने से पहले, क्या उस जगह पर कभी कोई और धार्मिक स्थल मौजूद था.

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मंदिर का दावा करने वाले पक्ष का क्या कहना है?

ज्ञानवापी मस्जिद में मंदिर का दावा करने वाले पक्ष ने दिसंबर 2019 में निचली अदालत में एक याचिका दायर की थी. इसमें एएसआई से पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण कराने का अनुरोध किया गया था. याचिका में दावा किया गया था कि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण लगभग दो हजार साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने कराया था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1669 में इसे तुड़वाकर, उसकी जगह मस्जिद (ज्ञानवापी) का निर्माण करा दिया. मंदिर का दावा करने वालों का कहना है कि वर्तमान में जो विश्वनाथ मंदिर बना हुआ है, उसे मस्जिद निर्माण के करीब सौ साल बाद 1780 में मालवा की रानी अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया था. वाराणसी में यह आधुनिक विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद एक-दूसरे से सटे हुए हैं, लेकिन उनके रास्ते अलग-अलग दिशाओं में हैं. कोर्ट का आदेश आने के बाद मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने मीडिया से कहा, ‘… अयोध्या के मामले में भी अदालत ने एएसआई से सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया था और तभी सच्चाई सामने आ सकी जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था.’

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मस्जिद प्रबंधन समिति और सुन्नी वक्फ बोर्ड का क्या कहना है?

ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन यानी अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद की समिति एएसआई द्वारा सर्वेक्षण कराए जाने की मांग का विरोध कर रही है. मस्जिद समिति और सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कोर्ट में दाखिल प्रतिवाद पत्र में दावा किया गया था कि मस्जिद की जगह कभी विश्वनाथ मंदिर था ही नहीं और औरंगजेब ने उसे कभी तोड़ा ही नहीं. सिविल कोर्ट का आदेश आने के बाद उत्तर प्रदेश सुन्नी वक़्फ बोर्ड के अध्यक्ष ज़फर अहमद फारूक़ी ने अपने एक बयान में कहा, ‘कोर्ट में ऐसा कोई सबूत नहीं पेश किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि वहां पर मस्जिद की जगह कभी कोई मंदिर था. अयोध्या मामले में भी एएसआई की खुदाई से कोई फ़ायदा नहीं हुआ. वो यह साबित नहीं कर पाए थे कि बाबरी मस्जिद को मंदिर को गिराकर बनाया गया था… हम वाराणसी सिविल कोर्ट द्वारा दिए गए इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे. हम समझते हैं कि इस मामले में, उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत मनाही है.’

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उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 क्या कहता है?

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद का मामला इससे पहले भी अदालत में पहुंच चुका है. 1991 में वाराणसी सिविल कोर्ट में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशजों ने मस्जिद पर मालिकाना हक को लेकर एक याचिका दाखिल की थी. इस मामले को लेकर 1998 में, ज्ञानवापी मस्जिद की समिति इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंच गई, और दलील दी कि इस विवाद पर निर्णय नहीं किया जा सकता, क्योंकि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत इसकी मनाही है. इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी, और तब से यह मामला हाईकोर्ट में लंबित है. हालांकि, उस समय हिंदू पक्ष का कहना था कि उपासना स्थल अधिनियम, 1991, ज्ञानवापी मस्जिद पर लागू नहीं होता क्योंकि मस्जिद मंदिर के अवशेषों के ऊपर बनी हुई है, जिसके कुछ हिस्से अभी तक मौजूद हैं. साल 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) कानून बनाया था. इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता. यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल के साथ जुर्माना भी देना पड़ सकता है.

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ऊपरी अदालत में क्या हो सकता है?

कानून से जुड़े कुछ जानकारों की मानें तो काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद मामला ऊपरी अदालत में ख़ारिज होने की संभावना ज्यादा है. सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों ने 18 महीने पहले जब राम मंदिर को लेकर फैसला सुनाया था तो कहा था कि उपासना स्थल कानून-1991, बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद पर लागू नहीं होता क्योंकि यह मामला एक अपवाद है जिस पर 15 अगस्त 1947 से पहले से विवाद चल रहा है. न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी लिखा था कि किसी और मामले को अपवाद का दर्जा पाने का हक नहीं है, न ही यह वैधानिक अथवा संवैधानिक रूप से संभव है. राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सुन्नी सेंट्रल वक़्फ बोर्ड की ओर से वकील रहे जफरयाब जिलानी के मुताबिक ‘एक तो यह आदेश 1991 के पूजा स्थल क़ानून का खुले तौर पर उल्लंघन करता है, दूसरा यह मामला पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित है तो इस पर सिविल कोर्ट कोई आदेश कैसे जारी कर सकता है.’ वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता भी अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि ऊपरी अदालत को कोई भी समझदार जज वाराणसी कोर्ट के इस आदेश को खारिज कर सकता है.

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