अमेरिका अफगानिस्तान

विचार-रिपोर्ट | विदेश

क्यों अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान छोड़ने से भारत की परेशानियां बढ़ने वाली हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की ताज़ा घोषणा ने भारत को दो मोर्चों पर चिंतित कर दिया है

अभय शर्मा | 21 अप्रैल 2021 | फोटो : यूएस आर्मी/फेसबुक

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राष्ट्रपति जो बाइडन का फैसला

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की है कि इस साल 11 सितंबर तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया जाएगा. व्हाइट हाउस से बुधवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में बाइडन ने कहा, ‘11 सितंबर, 2001 की घटना के 20 साल पूरा होने से पहले अमेरिकी सैनिकों के साथ नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन के देशों और अन्य सहयोगी देशों के सैनिक भी अफगानिस्तान से वापस आ जाएंगे.’ अफगानिस्तान में इस समय अमेरिका के 2,500 और नाटो एवं अन्य देशों के करीब छह हजार सैनिक तैनात हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इन सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया एक मई से शुरु हो जायेगी.

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अमेरिका ने यह फैसला क्यों लिया?

न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में आतंकियों के खिलाफ जंग शुरू की थी. उसने इसके बाद से हमेशा तालिबान के खिलाफ आक्रामक नीति अपनाए रखी लेकिन शुरुआत में कमजोर होने के बाद उसकी ताकत लगातार बढ़ती ही रही. इस समय तालिबान का देश के 40 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर कब्जा है. उधर अमेरिका को इस लड़ाई की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. इस दौरान उसके 2300 से ज़्य़ादा पुरुष और महिला सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी, 20,000 से ज़्यादा सैनिक घायल हुए और वह अफगानिस्तान में अब तक 850 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है. जानकारों की मानें तो अमेरिका को अब शायद समझ में आ गया है कि तालिबान से नहीं लड़ा जा सकता क्योंकि वह अनिश्चित समय के लिए लड़ने की सोच चुका है.

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अफगान शांति वार्ता का क्या हुआ?

बीते साल 29 फरवरी को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान में शांति के लिए तालिबान के साथ एक समझौता किया था. इस समझौते में तालिबान ने जल्द ही अफगान सरकार से बातचीत शुरू करने का वादा भी किया था. अमेरिका के काफी दबाव के बाद अफगान सरकार और तालिबान के बीच बीते सितंबर में बातचीत शुरु भी हुई. लेकिन सात महीने बीतने के बाद भी अब तक बातचीत के साझा एजेंडे पर ही सहमति नहीं बन सकी है. उधर, कुछ महीनों से तालिबान ने अपने हमले भी तेज कर दिए हैं. यानी अफगान शांति वार्ता पूरी तरह से बेपटरी हो चुकी है. विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के ताज़ा ऐलान के बाद अफगान शांति वार्ता के सफल होने की उम्मीद बेहद कम बची है क्योंकि इससे तालिबान का मनोबल और बढ़ना तय है. ऐसे में कइयों को अफगानिस्तान में फिर से गृहयुद्ध छिड़ने और तालिबान का शासन आने का डर सता रहा है.

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भारत की पहली चिंता

भारत बीते कई सालों से अफगानिस्तान को फिर से उठ खड़ा होने में मदद कर रहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस समय अफगानिस्तान में करीब 1700 भारतीय मौजूद हैं, जो वहां बैंकिंग, सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों में काम करते हैं. अफगान सरकार से हुए समझौते के तहत भारत ने वहां बड़े पैमाने पर निवेश किया है. अफगानिस्तान का नया संसद भवन बनाने के अलावा भारत वहां बांध, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पताल बनाने की योजनाओं से भी जुड़ा है. हम अफगानिस्तान को कृषि, विज्ञान, आईटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी सहयोग दे रहे हैं. 2016 के समझौते के तहत भारत की ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगान सीमा तक रेल चलाने की योजना है. अब अगर अफगान शांति वार्ता विफल रहती है या उसके नतीजे भारत के अनुकूल नहीं रहते हैं, तो उसकी अफगानिस्तान में चल रही इन योजनाओं पर पानी फिर सकता है.

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भारत की दूसरी चिंता

अफगानिस्तान में 1996 से 2001 तक तालिबान का शासन था. इस दौरान तालिबान और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों की सांठगांठ ने भारत को बड़ी क्षति पहुंचाई थी. अगर अफगान शांति वार्ता विफल रहती है तो अफगानिस्तान के फिर से आतंकवाद की शरणस्थली बनने का खतरा बना रहेगा. अंतरराष्ट्रीय मामलों की अमेरिकी विशेषज्ञ लीजा कर्टिस का कहना है कि ‘भारत, अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाये जाने और वहां तालिबान के फिर से सिर उठाने से अत्यधिक चिंतित होगा… अफगानिस्तान में जब तालिबान का नियंत्रण था, तब उसने धन उगाही के लिए आतंकवादियों को पनाह दी थी, उन्हें प्रशिक्षित किया था… लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को भारतीय संसद पर हमले के लिए तैयार किया गया था.’ 1999 में जैश-ए-मोहम्मद गुट के आतंकियों ने ही भारतीय विमान – आईसी 814 – का अपहरण किया था. वे इसे लेकर वे अफगानिस्तान गए थे जहां तालिबान ने उनका पूरा साथ दिया था.

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