फोर्ड इकोस्पोर्ट कार

विचार-रिपोर्ट | वाहन

क्या वजह है कि फोर्ड भारत के बाज़ार से हाथ खींचने की तैयारी कर रही है?

भारतीय बाज़ार में फोर्ड की छवि ‘हैवी मेंटेनेंस’ वाली मजबूत गाड़ियां बनाने वाली कंपनी की है

ब्यूरो | 16 अप्रैल 2019 | फोटो: फ्लिकर

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अमेरिका की कार निर्माता कंपनी फोर्ड जल्द ही भारत में अपना स्वतंत्र व्यापार बंद कर सकती है. लेकिन इस बात से उन लोगों को फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं जो फोर्ड की गाड़ियां इस्तेमाल कर रहे हैं या खरीदना चाहते हैं. फोर्ड भारतीय बाज़ार को पूरी तरह अलविदा नहीं कह रही है बल्कि यह भारत की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा के साथ साझेदारी कर एक नए ‘जॉइंट वेंचर’ (जेवी) की शुरुआत करने जा रही है. बताया जा रहा है कि इसकी 49 फीसदी भागीदारी फोर्ड और 51 प्रतिशत भागीदारी महिंद्रा के नियंत्रण में होगी. यह डील अगले तीन महीनों में फाइनल हो सकती है.

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वैश्विक स्तर पर फोर्ड की गिनती शीर्ष पांच वाहन निर्माता कंपनियों में होती है जिसके पास अलग-अलग लाइनअप में मॉडल्स की एक विस्तृत रेंज मौजूद है. लेकिन भारत में यह मुकाम हासिल करने में कंपनी नाकाम रही. दरअसल भारतीय बाज़ार में फोर्ड की छवि ‘हैवी मेंटेनेंस’ वाली मजबूत गाड़ियां बनाने वाली कंपनी की है. विश्लेषक बताते हैं कि भारत जैसे देश में जहां गाड़ी खरीदने से पहले उसकी कीमत, माइलेज और मेंटनेंस से जुड़े प्रश्न सबसे पहले पूछे जाते हैं और सुरक्षा संबंधी सवाल सबसे आख़िर में, वहां इस रवैये का ज्यादा चल पाना मुश्किल ही था.

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बीते दो दशक से भारतीय बाज़ार में रहने के बावजूद फोर्ड सिर्फ तीन फीसदी हिस्से पर ही कब्जा जमा पाई है. यहां कंपनी की हैचबैक फिगो, क्रॉसओवर- फ्रीस्टाइल, सबकॉम्पैक सेडान- एस्पायर, कॉम्पैक एसयूवी- इकोस्पोर्ट, एसयूवी- एंडेवर, स्पोर्ट्स कार- मस्टेंग, गाड़ियां मौजूद हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ इकोस्पोर्ट ही ग्राहकों की तरफ से संतोषजनक प्रतिक्रिया हासिल करने में सफल मानी गई. अपने सेगमेंट में एंडेवर ने भी ठीक-ठाक प्रदर्शन कर कंपनी की लाज को बचाए रखा. परंतु यह कंपनी को संभालने के लिए काफी नहीं था.

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बीते कुछ वर्षों में फोर्ड ने विज्ञापनों की सीरीज़ के ज़रिए खुद को किफ़ायती मेंटनेंस वाली कंपनी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है. लेकिन इस मोर्चे पर उसकी तरफ से करीब 20 वर्ष तक बरती गई ढिलाई इस नई कवायद पर भारी साबित हुई. दूसरी तरफ भारतीय बाज़ार में चीन की ऑटोमोबाइल कंपनी ‘किआ’ और ब्रिटिश कंपनी ‘एमजी’ के आने की वजह से फोर्ड की मुश्किलें और बढ़ती दिख रही थीं. ऐसे में फोर्ड ने भारत से अपने संसाधनों और प्रंबधन को समेट कर उनका इस्तेमाल किसी नए बाज़ार में करना मुनासिब समझा है जहां से उसे सार्थक परिणाम मिलने की उम्मीद हो.

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फोर्ड के इस फैसले से उसके कर्मचारियों को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. बताया जा रहा है कि स्वतंत्र ऑपरेशन बंद होने के बाद कंपनी की भारत में मौजूद अधिकतर परिसंपत्तियों और कर्मचारियों को नई साझा कंपनी में स्थानांतरित कर दिया जाएगा.

सत्याग्रह की रिपोर्ट पर आधारित.

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