तिरंगा, भारतीय मुद्रा

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

क्या इलेक्टोरल बॉन्ड्स ने राजनीतिक चंदे की व्यवस्था को और भी कम पारदर्शी कर दिया है?

अगर दुनिया के तमाम विकसित देशों में राजनीतिक चंदे से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक हो सकते हैं तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता?

ब्यूरो | 19 अप्रैल 2019

1

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2018 में चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था बनाई थी. इसमें ये प्रावधान है कि बैंक एक हजार से लेकर एक करोड़ तक के चुनावी बॉन्ड जारी करेंगे जिन्हें खरीदकर राजनीतिक दलों को चंदा दिया जा सकेगा. चुनावी बॉन्ड आने से पहले राजनीतिक दलों को अपने आय विवरण में केवल उन्हीं चंदों का जिक्र करना होता था जो 20 हजार से ऊपर के होते थे. इससे कम की राशि को वे नकद ले सकते थे. इससे चंदे के स्रोत का पता नहीं चल पाता था.

2

चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए नियम ये है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कोई भी इन्हें खरीद सकता है. लेकिन बैंक इन्हें खऱीदने वालों से जुड़ी कोई भी जानकारी किसी और को नहीं दे सकता. इन बॉन्डों पर किसी का नाम नहीं होता है. यानी कि किसी पार्टी को मिले बॉन्डों के स्रोत का पता उसके अलावा किसी और को नहीं होता. लेकिन पार्टियों को केवल ये बताना होता है कि उन्हें इलेक्टरोल बॉन्ड के जरिये कितना पैसा मिला. ये नहीं कि उन्हें ये पैसा किसने दिया.

3

चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था लागू होने के बाद अब कोई भी दल दो हजार से ऊपर का चंदा नकद नहीं ले सकता है. पहले ये रकम बीस हजार थी. चूंकि बॉन्ड के जरिये मिलने वाला चुनावी चंदा बैंक के हिसाब-किताब में होगा इसलिए इसे नकद चंदे से बेहतर कहा जा सकता है. लेकिन, चुनावी बॉन्डों पर गोपनीयता के इतने आवरण चढ़ा दिए गए हैं कि ये अपने घोषित उद्देश्यों पर खरे उतरते नहीं दिखते हैं.

4

इस बारे में सरकार का तर्क ये है कि अगर चुनावी चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक किए गए तो इससे उन्हें दूसरी पार्टियों के शासन में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. चंदा देने वाले की निजता का सवाल भी उठाया जा रहा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये तर्क इतने बड़े हैं कि इनकी वजह से मतदाताओं के जानने के अधिकार और राजनीतिक भ्रष्टाचार को ताक पर रख दिया जाए?

5

कुछ जानकार मानते हैं कि अगर चुनावी चंदा देने के लिए गोपनीयता जरूरी है भी तो भी चुनाव आयोग जैसी संस्था को तो इसकी जानकारी दी ही जा सकती है! हालांकि सबसे बेहतर तरीका तो यही होगा कि राजनीतिक चंदे से जुड़ी सभी जानकारियां पूरी तरह से सार्वजनिक हों. अगर दुनिया के तमाम विकसित देश ऐसा कर सकते हैं तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता है?

  • ममता बनर्जी

    विचार-रिपोर्ट | राजनीति

    पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने के तरीके को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना करना कितना जायज़ है?

    ब्यूरो | 05 मार्च 2021

    किसान आंदोलन

    विचार-रिपोर्ट | किसान

    क्या किसान आंदोलन कमजोर होता जा रहा है?

    ब्यूरो | 03 मार्च 2021

    नरेंद्र मोदी स्टेडियम

    तथ्याग्रह | राजनीति

    क्या सरकार का यह दावा सही है कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम नहीं था?

    ब्यूरो | 26 फरवरी 2021

    अमित शाह

    विचार-रिपोर्ट | राजनीति

    क्या पश्चिम बंगाल में सीबीआई की कार्यवाही ने भाजपा को वह दे दिया है जिसकी उसे एक अरसे से तलाश थी?

    ब्यूरो | 24 फरवरी 2021