डोनाल्ड ट्रंप

विचार-रिपोर्ट | विदेश

क्यों डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का सबसे बुरा राष्ट्रपति नहीं कहा जाएगा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पूरा कार्यकाल विवादित फ़ैसलों से भरा रहा है, लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे काम भी किए जो शायद ही कोई और कर सकता था

अभय शर्मा | 18 दिसंबर 2020 | फोटो: फेसबुक-डोनाल्ड ट्रंप

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सीरियाई सरकार के खिलाफ जंग न लड़ने का फैसला

2016 में अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव जीतने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने यह ऐलान कर दिया था कि वे सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से हटाने का प्रयास बंद कर देंगे. उन्होंने अपनी लगभग हर रैली में यह दावा किया था कि अगर डेमोक्रेटिक प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन चुनाव जीतीं तो देश को तीसरे विश्व युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए. चुनाव प्रचार में हिलेरी ने बराक ओबामा के पदचिन्हों पर चलते हुए सीरिया में बशर अल-असद को सत्ता से हटाने का वादा किया था. ओबामा के पूरे कार्यकाल में अमेरिका असद को सत्ता से हटाने में लगा रहा, उसने इसके लिए न सिर्फ वहां के विद्रोहियों बल्कि आतंकी संगठन अलकायदा को भी हथियार दिए. जानकारों की मानें तो डोनाल्ड ट्रंप अगर असद के खिलाफ जंग जारी रखते तो सीरिया में अभी भी शांति कोसों दूर होती. इससे इस्लामिक स्टेट को तो बड़ा फायदा मिलता ही, साथ ही तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति भी बन सकती थी. इसकी वजह थी कि रुस पहले ही खुलकर विद्रोहियों के खिलाफ बशर अल-असद के पक्ष में उतर चुका था. अगर डोनाल्ड ट्रंप न होते तो सीरिया में एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ रूस खड़ा होता और यह जंग कभी खत्म न होने वाली स्थिति में होती.

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उत्तर कोरिया से हमले का खतरा कम किया

2011 में देश का सुप्रीम लीडर बनते ही उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने युद्ध स्तर पर अत्याधुनिक मिसाइलों और परमाणु हथियारों का निर्माण शुरू कर दिया. बराक ओबामा के कार्यकाल में दो परमाणु परीक्षण करने के बाद 2016 में उन्होंने हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. ओबामा प्रशासन ने इसके बाद कोरिया पर लगे प्रतिबंध और कड़े कर दिए लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ. 2017 में जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने तो उत्तर कोरिया ने फिर से परमाणु परीक्षण किया. इसके बाद ट्रंप ने उस पर इतने कड़े प्रतिबंध लगाए कि उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था की कमर टूट गयी. डोनाल्ड ट्रंप की सक्रियता के चलते उसे चीन और रूस से मिलने वाली मदद पर भी लगाम लग गई. साथ ही ट्रंप ने उत्तर कोरिया की धमकियों का उसी की भाषा में जवाब भी दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि किम जोंग उन अपनी सुरक्षा की गारंटी की शर्त पर अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार हो गए. उन्होंने कई परमाणु परीक्षण केंद्रों को बंद करने की भी घोषणा की. इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ी और उनके राष्ट्र प्रमुखों की मुलाकात भी हुई. इन मुलाकातों का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं जिनके चलते किम जोंग उन को उनके आगे झुकना पड़ा.

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चीन की मनमानी पर शिकंजा

अमेरिका में चीन से होने वाले आयात का एक लंबे समय से विरोध होता आ रहा है. इस विरोध के दो प्रमुख कारण हैं – बड़ा व्यापार घाटा यानी निर्यात से बहुत ज्यादा चीन से आयात होना और चीन द्वारा अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी. राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी बौद्धिक संपदा में सेंधमारी को लेकर चीन के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए. इस जांच में अमेरिकी कंपनियों द्वारा चीन पर लगाए गए बौद्धिक संपदा की चोरी के अधिकांश मामले सही निकले. जांच अधिकारियों के मुताबिक चीन में अमेरिकी कंपनियों की जासूसी कराई जाती है. वहां अमेरिकी कंपनियों के आगे शर्त रखी जाती है कि वे चीनी कंपनियों के साथ साझेदारी करें. इसके सात साल बाद दोनों कंपनियों को मिलकर एक साझा प्रोडक्ट तैयार करना पड़ता है. इसके जरिए चीन उनका तकनीक ज्ञान हासिल करने की कोशिश करता है. अधिकारियों का यह भी कहना था कि चीन किसी ख़ास रणनीति के तहत अमेरिका में कुछ सेक्टर्स में निवेश कर रहा है ताकि उनसे जुड़ी गोपनीय जानकारियां हासिल की जा सकें. जांच के बाद डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि चीन अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी कर अमेरिका को हर साल 250 से 500 अरब डॉलर तक का नुकसान पहुंचाता है, साथ ही उसकी वजह से अमेरिका को हर साल करीब 300 अरब डॉलर का व्यापार घाटा भी होता है. इसके बाद ट्रंप ने चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करने और बौद्धिक संपदा में सेंधमारी रोकने के लिए सख्त कदम उठाने शुरू कर दिया. इनमें चीनी उत्पादों पर शुल्क लगाना भी शामिल था. उन्होंने राजस्व विभाग को ऐसे नियम बनाने का आदेश भी दिया जिससे अमेरिका में चीनी निवेश को सीमित किया जा सके.

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तालिबान से बातचीत की पहल

बीते साल अफगानिस्तान में अपने सैनिकों को सम्बोधित करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना था, ‘महान देश कभी वे युद्ध नहीं लड़ते, जिनका कभी अंत न हो.’ ट्रंप ने यह बात अपने उस फैसले को लेकर कही थी जिसमें उन्होंने तालिबान से सुलह करने और अमेरिकी फ़ौज के अफगानिस्तान छोड़ने की पहल की थी. अमेरिकी फ़ौज पिछले 17 सालों से तालिबान का मुकाबला कर रही है लेकिन फिर भी उसकी ताकत लगातार बढ़ती जा रही है. बावजूद इसके पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों – बराक ओबामा और जॉर्ज बुश – ने तालिबान से सीधी बातचीत करने या अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला नहीं लिया. इसके पीछे यह डर था कि दुनिया भर में अमेरिका की किरकिरी न हो जाये. लेकिन ट्रंप ने यह फैसला लेने की हिम्मत दिखाई. उनका कहना था कि बीते 17 सालों में अमेरिका अफगानिस्तान में अपने हजारों सैनिक गंवा चुका है, और 840 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है इसलिए अब बातचीत ही अकेला रास्ता है. बीते डेढ़ साल में अमेरिका और तालिबान के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है और कुछ मसलों पर दोनों के बीच समझौता भी हुआ है. साफ़ है कि डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान के मसले को भी ऐसे मोड़ पर छोड़कर जा रहे हैं, जहां से सुलह का रास्ता भी दिखाई देता है.

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अब्राहम समझौता

क्या कभी कोई यह भी सोच सकता था कि अरब देश और उनका कट्टर विरोधी इजरायल एक छतरी के नीचे आ सकते हैं! बीते 15 सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के विदेश मंत्रियों ने एक ऐतिहासिक शांति समझौते ‘अब्राहम एकॉर्ड‘ पर हस्ताक्षर किए. यह बीते 26 वर्षों में इजरायल और अरब के बीच पहला शांति समझौता है. इस समझौते के तहत यूएई और बहरीन, इज़राइल को मान्यता देने के साथ-साथ उसके साथ अपने आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सम्बंधों को बेहतर बनाएंगे. इसके बदले इज़राइल ने वेस्ट बैंक क्षेत्र पर कब्जा करने की अपनी योजना को स्थगित करने का ऐलान किया. इज़राइल ने वर्ष 1979 में मिस्त्र और 1994 में जॉर्डन के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये थे. लेकिन यूएई और अन्य अरब देशों ने इज़राइल को मान्यता नहीं दी थी. 1948 में जब मध्य-पूर्व में यहूदी देश इजरायल की स्थापना हुई थी, उस समय ही अरब देशों ने उसे अलग-थलग कर दिया था. इन देशों का कहना था कि जब तक गाजा, वेस्ट बैंक और इजरायल द्वारा कब्जाए गए इलाकों में एक अलग मुस्लिम राष्ट्र – फिलीस्तीन – को मान्यता नहीं मिलती, तब तक वे इजरायल से किसी तरह के संबंध नहीं रखेंगे. जानकारों के मुताबिक इन देशों को करीब लाने में डोनाल्ड ट्रंप के साथ-साथ उनके दामाद एवं मध्य-पूर्व मामलों में राष्ट्रपति के सलाहकार जेरेड कुशनर ने भी मध्यस्थ की भूमिका अदा की है.

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