राहुल गांधी

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

केरल का विधानसभा चुनाव राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए सबसे ख़ास क्यों है?

कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो अगर पार्टी केरल का चुनाव जीत जाती है तो इससे उसकी कई बड़ी मुश्किलें हल हो जाएंगी

अभय शर्मा | 04 अप्रैल 2021 | फोटो : राहुल गांधी/फेसबुक

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछला लोकसभा चुनाव अपनी परंपरागत सीट अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से भी लड़ा था. अमेठी में उन्हें भाजपा नेता स्मृति ईरानी से हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन वायनाड में उन्होंने चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की थी. केरल से सांसद होने के चलते राहुल गांधी के लिए यहां के विधानसभा चुनाव की अहमियत बदल जाती है. यहां कांग्रेस पार्टी जैसा भी प्रदर्शन करेगी उसे उनकी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाएगा. देखा जाए तो राहुल गांधी के लिए केरल का चुनाव लगभग वैसा ही है जैसा अगले साल उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए होगा. नरेंद्र मोदी का गृह राज्य गुजरात है, लेकिन वे उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सांसद हैं.

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केरल में बीते 40 सालों के दौरान कोई भी राजनीतिक दल लगातार दो विधानसभा चुनाव नहीं जीत सका है. राज्य में इन 40 सालों के दौरान बारी-बारी से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन और सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन की सरकार बनती रही है. केरल में पिछला विधानसभा चुनाव एलडीएफ ने जीता था, ऐसे में इस बार यूडीएफ के सत्ता में आने की उम्मीद जताई जा रही है. लेकिन अगर यूडीएफ इस बार सत्ता में नहीं आ सका तो जाहिर है कि इस गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस के लिए स्थिति बेहद शर्मिंदगी वाली होगी. इससे यह संदेश जाएगा कि चालीस फीसदी से ज्यादा अल्पसंख्यक आबादी वाला राज्य भी अब कांग्रेस को किसी भी तरह के विकल्प के तौर पर देखते हुए उसके हाथ मजबूत नहीं करना चाहता.

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2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 52 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. उत्तर भारत के कई राज्यों में तो उसका सूपड़ा साफ़ ही हो गया था. लेकिन केरल एक ऐसा राज्य था, जहां कांग्रेस ने अन्य राज्यों से उलट शानदार प्रदर्शन किया था. यहां यूडीएफ गठबंधन ने 20 में से 19 सीटें जीती थीं, इनमें अकेले कांग्रेस के खाते में 15 सीटें थीं. ऐसे में अगर आगामी विधानसभा चुनाव में एलडीएफ की की जीत और यूडीएफ की हार होती है, तो यह कांग्रेस पार्टी के मनोबल को और भी नीचे ले जाने वाला होगा क्योंकि इसे साफ़ हो जाएगा कि कांग्रेस की स्थिति समय के साथ-साथ और लचर होती जा रही है. इससे यह सन्देश जाएगा कि जिन राज्यों में उसकी हालत बेहतर मानी जा रही थी वहां भी लोगों ने कांग्रेस को एक विकल्प के तौर पर देखना बंद कर दिया है.

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कांग्रेस पार्टी के कई सूत्रों का कहना है कि अगर पार्टी केरल का चुनाव जीत जाती है, तो उसे एक बड़ी समस्या से छुटकारा मिल जाएगा. यह समस्या पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ी है. कांग्रेस ने 2019 का आम चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा था और जब पार्टी बुरी तरह हारी तो उन्होंने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. पिछले दिनों खबरें आयीं कि राहुल अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हो गए हैं. लेकिन पार्टी हाईकमान को डर है कि पार्टी में बड़े बदलावों की मांग करने वाला 23 वरिष्ठ नेताओं का एक धड़ा इसका विरोध कर सकता है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि पिछले डेढ़ सालों के दौरान जो भी चुनाव हुए उनमें पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी है. ऐसे में अगर कांग्रेस केरल का चुनाव जीतती है तो इसका श्रेय केवल राहुल गांधी को जाएगा और इससे उनके पार्टी अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ़ हो जाएगा.

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चुनावों में जाने वाले चार राज्यों – पश्चिम बंगाल, केरल, असम और तमिलनाडु – में से दो – असम और केरल – ही ऐसे हैं जिनमें कांग्रेस उन गठबंधनों का नेतृत्व कर रही है जो विधानसभा चुनाव जीत सकते हैं. इनमें भी हाल तक केरल की जीत सबसे आसान मानी जाती रही है. इसके अलावा केरल में गांधी परिवार का हमेशा से एक विशेष प्रभाव रहा है. ऐसे में अगर कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन केरल का चुनाव हार जाता है तो इसे कांग्रेस की बुरी स्थिति में इज़ाफे के साथ-साथ राज्य और देश में गांधी परिवार के बचे-खुचे प्रभाव के खात्मे के तौर पर भी देखा जा सकता है.

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