राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन

विचार-रिपोर्ट | विदेश

कैसे एक मुस्लिम देश ने ही उइगरों की बची-खुची आवाज़ को भी बंद करने का इंतजाम कर दिया है

चीन की संसद ने तुर्की के साथ उस प्रत्यर्पण समझौते को मंजूरी दे दी है जिसे उइगर मुसलमानों के लिए बेहद खतरनाक माना जा रहा है

ब्यूरो | 14 जनवरी 2021 | फोटो : तुर्की सरकार

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क्या हुआ है?

हाल ही में चीन की संसद ने मुस्लिमों के सबसे बड़े रहनुमा मुल्क तुर्की के साथ हुए एक प्रत्यर्पण समझौते को मंजूरी दे दी. इस समझौते का मकसद अंतरराष्ट्रीय अपराधियों और आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए दोनों देशों के बीच न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग स्थापित करना है. 2017 में तुर्की के राष्‍ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने अपनी चीन यात्रा के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. अभी तुर्की की संसद द्वारा इस समझौते को हरी झंडी दिखाना बाकी है. लेकिन खबरों के मुताबिक तुर्की की सरकार जल्द ही इसे अपनी संसद में पेश करने वाली है. जानकारों के मुताबिक इस समझौते को तुर्किश संसद की मंजूरी मिलने के बाद इसका सबसे खतरनाक असर तुर्की में रह रहे करीब 50 हजार उइगर समुदाय के लोगों पर पड़ सकता है.

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उइगर कौन हैं?

इस्लाम को मानने वाले उइगर समुदाय के लोग चीन के सबसे बड़े और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र शिंजियांग प्रांत में रहते हैं. इस प्रांत की सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों के साथ मिलती है. इस क्षेत्र में उइगर मुसलमानों की आबादी एक करोड़ से ऊपर है. पहले वे यहां बहुसंख्यक हुआ करते थे लेकिन जब से इस क्षेत्र में चीनी समुदाय हान की संख्या बढ़ी है और सेना की तैनाती हुई है, तब से स्थिति बदल गई है. शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर मुस्लिम ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ चला रहे हैं जिसका मकसद चीन से अलग होना है. दरअसल, 1949 में पूर्वी तुर्किस्तान, जो अब शिनजियांग है, को एक अलग राष्ट्र के तौर पर कुछ समय के लिए पहचान मिली थी, लेकिन उसी साल यह चीन का हिस्सा बन गया. 1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद इस क्षेत्र की आजादी के लिए यहां के लोगों ने काफी संघर्ष किया. उस समय इन लोगों के आंदोलन को मध्य एशिया में कई मुस्लिम देशों का समर्थन भी मिला था. लेकिन, चीनी सरकार के कड़े रुख के आगे किसी की एक न चली.

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चीन ने यह समझौता किस मकसद से किया?

चीन काफी पहले से उइगरों के खिलाफ दमन की नीतियां चला रहा है. लेकिन 2012-13 में बहुप्रचारित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के उद्घाटन के बाद से उसने इस समुदाय का दमन और तेज कर दिया. इसकी वजह है कि बीआरआई के तहत आने वाले तीन प्रमुख गलियारे शिनजियांग प्रांत से ही निकलते हैं. चीन को लगता है कि उइगर और उनसे जुड़े अलगाववादी संगठन बीआरआई प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसके चलते उइगर समुदाय के करीब दस लाख लोगों को सुधारगृहों में डाल दिया गया है. उइगरों को आम नागरिकों के अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन में सरकार-प्रायोजित अभियानों के तहत इस समुदाय से जुड़ी महिलाओं का जबरन बंध्याकरण और गर्भपात कराया जा रहा है. चीन में उइगरों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ और ‘ईस्ट तुर्किस्तान’ की आजादी के लिए तुर्की में रह रहे इस समुदाय के लोग आवाज उठाते रहे है, इन्होंने ही चीन के विरोध में कई वैश्विक संगठन भी खड़े किये हैं. इनके प्रयासों के चलते ही इस मुद्दे ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है. बीते सालों में कई बार अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उइगरों के साथ हो रही ज्यादती को लेकर चीन की आलोचना की है. ये देश चीन के खिलाफ कार्रवाई की योजना पर भी काम कर रहे हैं. जानकारों की मानें तो इस वजह से तुर्की में रहने वाले उइगर समुदाय के लोग चीन को खासे चुभते हैं और वह उन्हें आतंकी मानता है. तुर्की के साथ हुए हालिया प्रत्यर्पण समझौते के जरिए चीन इन लोगों को अपने यहां बुलाकर इनका मुंह बंद करना चाहता है.

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उइगरों का तुर्की से क्या नाता है?

1950 के समय जब चीन से बड़ी संख्या में उइगर समुदाय के लोग निर्वासित हुए तो तुर्की ने इन्हें पनाह दी थी. इसके बाद से तुर्की इनका सबसे अच्छा ठिकाना बन गया है. तुर्की ने इन्हें इसलिए शरण दी क्योंकि ये मूल रूप से वहीं के माने जाते हैं. उसके साथ इनके बेहद मजबूत सांस्कृतिक, भाषाई और मजहबी रिश्ते हैं. चीन में रह रहे उइगरों के साथ तुर्की के ज़्यादातर लोग और राजनेता ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर जुड़ाव महसूस करते हैं. तुर्की के राजनेता इस समुदाय के लोगों को आदिम तुर्क समाज के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन जब इस्तांबूल के मेयर थे, तब उन्होंने शहर की एक मस्जिद के एक हिस्से का नाम पूर्वी तुर्किस्तान के लिए आंदोलन करने वाले उइगरों के नेता इशा यूसुफ अल्टेकिन के नाम पर रख दिया था. एर्दोआन और उनकी सरकार कुछ साल पहले तक उइगरों के खिलाफ चीन की दमनकारी नीतियों का तीखा विरोध किया करते थे.

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रजब तैयब एर्दोआन ने चीन के साथ समझौता क्यों किया?

बीते करीब दो सालों से रजब तैयब एर्दोआन का चीन के प्रति रुख एकदम पलट गया है. इस दौरान वे शिंजियांग प्रांत को लेकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों की तारीफ़ तक करते देखे गए हैं. जानकार इस यूटर्न की वजह राष्ट्रपति एर्दोआन के आगे बनी परस्थितियों को बताते हैं. 2016 में एर्दोआन के तख्तापलट की नाकाम कोशिश हुई थी. तुर्की के राष्ट्रपति इस घटना के पीछे विदेशी ताकतों खासकर अमेरिका का हाथ मानते हैं. इस घटना के बाद से एर्दोआन ऐसी नीतियों पर जोर दे रहे हैं जिनसे सत्ता पर उनकी पकड़ और मजबूत हो. वे तुर्की की सैन्य ताकत को भी इतना बढ़ाना चाहतें हैं कि वह किसी भी देश को मुंहतोड़ जवाब दे सके. जानकार कहते हैं कि एर्दोआन की इन नीतियों के चलते तुर्की पर काफी आर्थिक बोझ पड़ा है. इसका असर तुर्की के बुनियादी ढांचे और उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है. देश में चल रहे इन आर्थिक संकटों से उबरने के लिए तुर्की को चीन का साथ मिला है. चीन ने तुर्की को 3.6 अरब डॉलर का कर्ज दिया है और ऐसे समझौते किए हैं कि जिससे वह तुर्की के सामान का सबसे बड़ा आयातक देश बन गया है. जानकारों की मानें तो इन्हीं वजहों के चलते तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन को चीन के साथ प्रत्यर्पण समझौता करने के लिए तैयार होना पड़ा है.

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