शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी

विचार-रिपोर्ट | नया साल

2019 में चीन की पांच चुनौतियां जिन पर उसका रुख भारत को भी प्रभावित करने वाला है

साल भर पहले तक लग रहा था कि चीन की हर चाल ठीक पड़ रही है. लेकिन अब समीकरण बदल गए हैं

ब्यूरो | 01 जनवरी 2019 | फोटो: पीआईबी

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व्यापार युद्ध

डोनाल्ड ट्रंप जब राष्ट्रपति बने थे तो चीन ने राहत की सांस ली थी. उसका मानना था कि हिलेरी क्लिंटन जैसी खांटी राजनेता की तुलना में कारोबारी पृष्ठभूमि वाले डोनाल्ड ट्रंप को खुश करना ज्यादा आसान है. बीते साल जब डोनाल्ड ट्रंप चीन की पहली आधिकारिक यात्रा पर गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनकी बढ़-चढ़कर आवभगत की. लेकिन मामला उल्टा पड़ गया. बीते साल साल अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ दिया. उसने चीन से अपने यहां आयात होने वाले 200 अरब डॉलर से भी ज्यादा के माल पर शुल्क ढाई गुना बढ़ा दिया. जवाब में चीन भी अमेरिका से अपने यहां आने वाले कृषि उत्पादों के लिए कोई और स्रोत देख रहा है. जानकारों के मुताबिक इससे भारत को फायदा हो सकता है. चीन उससे सोयाबीन और दूसरे कृषि उत्पाद मंगाने की इच्छा भी जाहिर कर चुका है. हालांकि व्यापार युद्ध के स्थायी समाधान के लिए वह यही चाहेगा कि डोनाल्ड ट्रंप अपना रुख एक बार फिर पहले जैसा कर लें.

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अर्थव्यवस्था

व्यापार युद्ध ने शी जिनपिंग के सामने खड़ी एक और चुनौती को जटिल कर दिया है. यह चुनौती है अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बढ़ता कर्ज. जानकारों के मुताबिक 2019 में चीनी अर्थव्यवस्था की विकास दर इस साल की अनुमानित 6.5 से घटकर 6.2 फीसदी पर आ सकती है. उधर, इस मोर्चे पर अमेरिका ने भी उसके लिए मुश्किल खड़ी कर रखी है. उसे विदेशी कंपनियों की तकनीक हासिल करने पर चीनी सरकार का जोर नहीं भा रहा. डोनाल्ड ट्रंप मांग करते रहे हैं कि चीन एक ऐसा कानून बनाए जो विदेशी कंपनियों को तकनीक के हस्तांतरण यानी टेक्नॉलॉजी ट्रांसफर के प्रावधान से छूट दे. अगर वह ऐसा करता है तो उसकी अपनी प्राथमिकताओं पर बुरा असर पड़ता है. अगर नहीं करता तो डोनाल्ड ट्रंप उसके लिए हालात और मुश्किल कर सकते हैं.

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बेल्ट एंड रोड परियोजना

2017 जब चीन ने संक्षेप में बीआरआई कही जाने वाली इस परियोजना पर बीजिंग में एक बड़ी बैठक बुलाई थी तो भारत ने इसका बायकॉट कर दिया था. उसने इसे लेकर पारदर्शिता की कमी से लेकर इस परियोजना का सदस्य बनने वाले देशों पर कर्ज के खतरे जैसी चिंताएं भी जताई थीं. तब कइयों ने माना कि भारत अलग-थलग पड़ गया है. अब बीआरआई पर दूसरी बैठक 2019 में होनी है और बीती बैठक से अब तक हालात काफी बदल चुके हैं. श्रीलंका, पाकिस्तान और केन्या जैसे देशों की इस परियोजनना के आर्थिक पहलुओं पर आपत्तियां बढ़ती जा रही हैं. कई देश अब अब उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें चीन से वित्तीय मदद रियायती दरों पर मिले. यहां पर भी चीन दुविधा में फंस गया है. अगर वह ऐसा करता है तो कर्ज देने वाली उसकी कंपनियों को नुकसान होगा. अगर ऐसा नहीं करता तो नए बाजारों तक पहुंचकर अर्थव्यवस्था को एड़ लगाने के मकसद से बनाई गई उसकी यह परियोजना खटाई में पड़ सकती है.

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आसपास वालों की आशंकाएं

एक लिहाज से देखें तो बीआरआई पर जताई जा रही चिंता चीन के उभार से आसपास के देशों को हो रही चिंताओं का ही हिस्सा है. ये चिंताएं भी डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद बढ़ी हैं जिन्होंने अमेरिका फर्स्ट का नारा देते हुए अपने देश को कई वैश्विक मंचों से समेटना शुरू कर दिया है. उनसे पहले चीन के आसपास के देशों की नीति यह होती थी कि वे चीन की आर्थिक ताकत का स्वागत करते थे और एशिया में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी का समर्थन. ये मौजूदगी उन्हें दक्षिण चीन सागर जैसे क्षेत्रीय विवादों में चीन की ताकत की काट भी देती थी. लेकिन अब इस क्षेत्र में अमेरिका की घटती दिलचस्पी ने उन्हें आशंकित कर दिया है. हालांकि चीन भी इसे समझते हुए आक्रामक रुख छोड़ पड़ोसियों से मेल-जोल बढ़ा रहा है. खबरें हैं कि 2019 की शुरुआत में ही शी जिनपिंग भारत दौरे पर आने वाले हैं.

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कम्युनिस्ट पार्टी का भविष्य

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी 2021 में अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करेगी. इस एक सदी के सफर में कई बार इसके खत्म होने की भविष्यवाणियां हुईं, लेकिन यह हर मुश्किल को सफलता से पार करती गई. लेकिन शी जिनपिंग के उभार ने पार्टी में नई चुनौतियां पैदा की हैं. कुछ समय पहले भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी के कई शीर्ष पदाधिकारियों को हटाया गया है. इसके अलावा देश के संविधान में एक अहम संशोधन भी हुआ है जिसके तहत राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा खत्म कर दी गई है. यानी अब शी जिनपिंग ताउम्र राष्ट्रपति रह सकते हैं. कई जानकार मानते हैं कि इससे कुछ समय बाद पार्टी में उथल-पुथल देखने को मिल सकती है.

(द प्रिंट की इस टिप्पणी पर आधारित)

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