एलन मस्क टेस्ला

विचार-रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

जिस बिटकॉइन को प्रतिबंधित करने की मांग हो रही है, उस पर टेस्ला ने दांव क्यों लगाया है?

बिटकॉइन के विवादास्पद होने के बाद भी टेस्ला ने अपने कुल कैश रिजर्व का आठ फीसदी इसमें निवेश किया है

अभय शर्मा | 18 फरवरी 2021 | फोटो : टेस्ला/ट्विटर

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क्या हुआ है?

इलेक्ट्रॉनिक कार निर्माता कंपनी टेस्ला ने बीते हफ्ते एक बड़ी घोषणा कर सभी को चौंका दिया. कंपनी ने विवादास्पद वर्चुअल मुद्रा बिटकॉइन में 1.5 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की. साथ ही टेस्ला की ओर से यह भी कहा गया है कि वह जल्द ही अपने ग्राहकों को कार खरीदने के लिए बिटकॉइन में पेमेंट करने की सुविधा मुहैया कराने पर भी विचार कर रही है. टेस्ला की इस घोषणा के बाद कई और बहुराष्ट्र्रीय कंपनियों के भी बिटकॉइन में निवेश की संभावना है. ट्विटर के फाइनेंस डायरेक्टर नेड सेगल ने संकेत दिया है कि उनकी कंपनी भी बिटकॉइन में निवेश करने पर विचार कर रही है. वहीं रॉयल बैंक ऑफ कनाडा के एक रिसर्च नोट में बताया गया है कि अगर एपल भी ऐसा कोई फैसला लेती है तो किस तरह उसे बड़ा मुनाफा हो सकता है. कुछ समय पहले तक टेस्ला के मुखिया एलन मस्क बिटकॉइन के खिलाफ हुआ करते थे, लेकिन कंपनी के निवेश करने की घोषणा के बाद से वे पूरी तरह इसके समर्थन में आ गए हैं. हाल ही में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, ‘मुझे अब लगता है कि बिटकॉइन अच्छी चीज है. मैंने इसमें देरी कर दी है… मैं बिटकॉइन का सपोर्टर हूं.’

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बिटकॉइन क्या है?

बिटकॉइन एक तरह की वर्चुअल करेंसी है जिसे क्रिप्टोकरेंसी (छिपी हुई मुद्रा) भी कहा जाता है. इसकी शुरुआत 2009 में हुई थी. माना जाता है कि इसे शुरू करने के पीछे सातोशी नाकोमोतो नाम के एक शख्स का दिमाग था. नाकामोतो के बारे में उनके नाम से अधिक कुछ भी जानकारी मौजूद नहीं है. वर्चुअल होने की वजह से बिटकॉइन का कोई कागजी हिसा-किताब नहीं होता है और इसके लिए कोई केंद्रीकृत व्यवस्था भी नहीं है. इसके लेन-देन में सरकार, केंद्रीय बैंक या अन्य वित्तीय एजेंसियों का कोई दखल नहीं होता है. यानी इसके लिए लोगों को किसी तरह का टैक्स नहीं चुकाना होता है. प्रत्येक बिटकॉइन और इसके मालिक को प्राइवेट और पब्लिक कीज (कोड) के जरिए पहचाना जाता है. जैसा कि नाम से ही जाहिर है पब्लिक की को बिटकॉइन के लेन-देन से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है. लेकिन प्राइवेट कोड केवल इसके मालिक के पास होता है. यदि यह कोड किसी और के हाथ लग जाता है तो वह इसे हासिल कर सकता है. बिटकॉइन के लेन-देन की पुष्टि करने और उसे सुरक्षित बनाने के लिए बनी प्रक्रिया को बिटकॉइन माइनिंग कहा जाता है. लेन-देन को ब्लॉक कहा जाता है और अतीत में हुए लेन-देन के सिलसिले को ब्लॉक चेन. यह एक तरह से बिटकॉइन का ऑनलाइन बही-खाता है, जिसे कोई भी देख सकता है.

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बिटकॉइन का लेन-देन किस तरह किया जाता है?

यदि कोई व्यक्ति बिटकॉइन खरीदना चाहता है तो इसके लिए उसे मोबाइल पर एप या फिर कंप्यूटर पर बिटकॉइन से संबंधित सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर आगे की प्रक्रिया पूरी करनी होती है. इसके बाद वह रुपये, डॉलर या अन्य करेंसी में इसे खरीद सकता है. साथ ही वह किसी ऐसे व्यक्ति से भी बिटकॉइन हासिल कर सकता है जिसके पास यह मौजूद हो. यदि किसी व्यक्ति के पास बिटकॉइन है और उसे वह सामान्य मुद्रा जैसे कि रुपये में बदलना चाहता है तो उसे यह वर्चुअल करेंसी इसे खरीदने के इच्छुक किसी व्यक्ति को बेचनी होगी. जहां तक वित्तीय संस्थाओं यानी केंद्रीय और वाणिज्यिक बैंकों की बात है, वहां बिटकॉइन को वैध मुद्रा में बदलने के रास्ते करीब-करीब बंद ही हैं. वैसे, दुनिया के कई देशों में बिटकॉइन जैसी वर्चुअल मुद्राओं को लेकर रिसर्च और प्रयोग किए जा रहे हैं. चीन का केंद्रीय बैंक ‘द पीपल्स बैंक ऑफ चाइना’ इसे प्रायोगिक तौर पर शुरू करने वाला दुनिया का पहला बैंक है. इसके अलावा नीदरलैंड में इसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए सीमित दायरे में वर्चुअल करेंसी को लेन-देन के लिए जारी किया है. साथ ही, द बैंक ऑफ जापान और यूरोपियन सेंट्रल बैंक में भी इस पर रिसर्च चल रही है.

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बिटकॉइन विवादास्पद क्यों है?

बिटकॉइन को भारत सहित तमाम देशों ने मान्यता नहीं दी है और इन देशों के केंद्रीय बैंकों ने इसे प्रतिबंधित करने की मांग भी की है. भारत सरकार के रुख की बात करें तो वह इसके खिलाफ है, पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संसद में कहा था कि सरकार इसे मान्यता नहीं देगी. वित्त मंत्रालय ने इसे एक तरह की पोंजी स्कीम की तरह माना है जिसमें भारी मुनाफे के लालच में लोग पैसा लगाते हैं, लेकिन बाद में मूल के भी लाले पड़ जाते है. इसी वजह से साल 2018 में भारतीय रिजर्व बैंक ने क्रिप्टोकरंसी पर प्रतिबंध भी लगा दिया था, लेकिन बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने यह रोक हटा दी थी. अब बीते कुछ समय से ऐसी खबरें आ रही हैं कि भारत सरकार इसे प्रतिबंधित करने के लिए कानून लाने जा रही है. दुनिया भर की केंद्रीय बैंक और सरकारें इसलिए बिटकॉइन के खिलाफ हैं क्योंकि इसका लेन-देन हवाला कारोबार की तरह ही है, जिसके बारे में सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है. साथ ही, इस तरह के अवैध लेन-देन से सरकार को टैक्स भी हासिल नहीं होता. इसके जरिए आतंकी फंडिंग की आशंका कई बार जताई जा चुकी है. इसके अलावा बिटकॉइन के जरिए कई तरह के अवैध कारोबारों को भी अंजाम देने की संभावना बनी हुई है. उदाहरण के लिए मई 2017 में 150 से अधिक देशों में वानाक्राई रैनसमवैयर वायरस ने कंप्यूटर पर हमला बोल दिया था. इसके लिए हैकरों ने प्रभावितों से बिटकॉइन में फिरौती की मांग की थी. हैकिंग के कई अन्य मामलों में भी ऐसा हुआ है.

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विवादास्पद होने के बाद भी टेस्ला ने बिटकॉइन पर दांव क्यों लगाया?

बिटकॉइन के विवादित होने के बाद भी टेस्ला अपने कुल कैश रिजर्व का आठ फीसदी बिटकॉइन में निवेश कर रही है. इसकी पहली बड़ी वजह बिटकॉइन की कीमत का तेजी से बढ़ना है. नवंबर, 2010 में अपने लॉन्च के एक साल बाद एक बिटकॉइन की कीमत 0.22 डॉलर (करीब 10 रु) थी. जून 2011 में एक बिटकॉइन की कीमत 32 डॉलर पहुंच गई. इसके बाद इसकी कीमत में गिरावट आयी, 2013 में इसकी शुरुआत 13.40 डॉलर से हुई और इसी साल इसने पहली बार 1,000 डॉलर का स्तर हासिल किया. बिटकॉइन की कीमत दिसंबर 2017 में 15,000 डॉलर यानी करीब 10 लाख रुपये का आंकड़ा पार कर गई. बीते हफ्ते बिटकॉइन की कीमत अपने उच्चतम स्तर 39,400 डॉलर पर थी और टेस्ला के इसमें निवेश की घोषणा के बाद यह कीमत बढ़कर 48,000 अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई. कहा जा रहा है कि टेस्ला के दांव के बाद अब 2021 के आखिर तक बिटकॉइन की कीमत दो लाख डॉलर तक पहुंच सकती है. कारोबार जगत के विशेषज्ञ बड़ी कंपनियों के बिटकॉइन में निवेश की दूसरी वजह दुनिया भर में छायी आर्थिक मंदी को मानते हैं. इनके मुताबिक आम तौर पर जब कंपनियों के पास नकदी ज्यादा हो जाती है तो वे बॉन्ड, शेयर या अन्य परिसंपत्तियों में निवेश करती हैं. लेकिन, पिछले कुछ समय से पूरी दुनिया सुस्ती की शिकार है, यह सुस्ती कोरोना वायरस के चलते 2020 में चरम पर पहुंच गयी. इस वजह से कंपनियां पहले की तरह निवेश से परहेज कर रही हैं और उनके पास नकदी और बढ़ गयी है. अर्थजगत के जानकार भुवन भास्कर अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘अगर अब ये कंपनियां ज्यादा दिन तक निवेश नहीं करेंगी, तो उनकी आमदनी घटेगी और उनकी प्रति शेयर आय कम होगी जिससे शेयर का बाजार भाव गिरेगा… लेकिन सुस्ती के चलते दुनिया में ब्याज दरें अपने न्यूनतम स्तर पर चल रही हैं. अमेरिका और जापान में तो यह शून्य के करीब हैं जिनमें आने वाले 3-4 वर्षों तक सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है.’ जानकारों की मानें तो यही वजह है कि टेस्ला जैसी बड़ी कंपनियां भी अब बॉन्ड, शेयर या अन्य परिसंपत्तियों की जगह निवेश के लिए बिटकॉइन जैसे नए ठिकाने खोज रही हैं.

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