सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान

विचार-रिपोर्ट | अर्थव्यवस्था

क्या भारत में तेल के दाम सऊदी अरब के खेल के चलते भी कम नहीं हो पा रहे हैं?

बीते कई महीनों से भारत और सऊदी अरब के बीच तेल के उत्पादन और कीमत को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है

अभय शर्मा | 03 मई 2021 | फोटो : पीआईबी

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कच्चे तेल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता देश सऊदी अरब ने कुछ दिन पहले एक ऐसा फैसला लिया, जिसे भारत के लिए बड़े झटके की तरह देखा जा रहा है. वहां की सरकारी तेल कंपनी सऊदी-अरामको ने एशिया के लिए भेजे जाने वाले कच्चे तेल का भाड़ा बढ़ाने का फैसला किया है. कंपनी ने चार अप्रैल को इसका ऐलान करते हुए कहा कि नयी कीमतें मई से प्रभावी होंगी. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस फैसले के बाद भारत जैसे देशों को कच्चे तेल के लिए एक बैरल पर 1.8 डॉलर ज्यादा चुकाने होंगे. सऊदी अरब उन तीन देशों में शुमार है जिनसे भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदता है, ऐसे में इस फैसले से भारत पर भारी आर्थिक बोझ पड़ना तय है. गौर करने वाली बात यह है कि सऊदी अरब ने यूरोप के लिए ढुलाई के दामों में कोई बदलाव नहीं किया है. और अमेरिका के लिए तो उल्टा उसने अपनी कीमतों में कटौती कर दी है.

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बीते कई महीनों से भारत और सऊदी अरब के बीच तेल की कीमतों को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है. पिछले साल सऊदी अरब के नेतृत्व वाले तेल उत्पादक देशों के संगठन – ओपेक – ने तेेल की गिरी हुई कीमतों को देखते हुए उसके उत्पादन में भारी कटौती की घोषणा की थी. इसके बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने लगीं. जब इससे भारत में तेल काफी महंगा हो गया तो भारत सरकार ने सऊदी अरब और ओपेक देशों से कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने की अपील की. लेकिन इसके बजाय ओपेक देशों ने इस साल जनवरी में उत्पादन को और कम कर दिया. इससे भारत में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपए के आसपास पहुंच गयीं. इसके बाद जब भारत ने एक बार फिर से सऊदी अरब से उत्पादन बढ़ाने की अपील की तो वहां के तेल मंत्री अब्दुल अज़ीज बिन सलमान अल-सऊद का कहना था, ‘भारत अपने उस स्ट्रैटेजिक तेल रिज़र्व का इस्तेमाल करे, जो उसने पिछले साल तेल की गिरती क़ीमत के बीच ख़रीद कर जमा किया था.’

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सऊदी अरब के तेल मंत्री के इस बयान से नाराज़ होकर भारत ने अरब देशों से आयात होने वाले तेल में बड़ी कटौती करने का फैसला कर लिया. इसमें सबसे ज्यादा 36 फीसदी की कटौती सऊदी अरब से होने वाले आयात में ही की गयी. भारत के इस फैसले के कुछ रोज बाद ही ओपेक देशों ने मई से तेल का उत्पादन बढ़ाने का ऐलान कर दिया. ओपेक के इस निर्णय से भारत को यह लगा कि उसकी कटौती के चलते ही ऐसा किया गया है. ओपेक देशों पर कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने का दबाव इसलिए भी था क्योंकि भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को लगातार उठा रहा था. लेकिन इसके दो दिन बाद ही सऊदी अरब ने एशियाई देशों के लिए तेल की ढुलाई के दाम बढ़ा दिए. अर्थजगत के जानकारों की मानें तो उसने यह फैसला भारत को ध्यान में रखकर ही लिया है. सऊदी अरब का यह फैसला भारत के लिए संदेश है कि कच्चे तेल का उत्पादन बढ़वा लेना ही उसके दाम कम होने के लिए काफी नहीं है.

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कई जानकारों का मानना है कि भारत ने केवल सऊदी अरब से नाराज होकर ही उसके तेल के आयात में कटौती करने का फैसला नहीं किया है. दरअसल अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों का तेल ‘हल्के कच्चे तेल’ की श्रेणी में आता है, जबकि अरब देशों में ‘मध्यम और भारी कच्चे तेल’ की अधिकता है. हल्के कच्चे तेल से एलपीजी और पेट्रोल बनता है जबकि भारी कच्चे तेल से डीजल बनता है. जानकारों की मानें तो बीते कुछ समय से भारत जैसे देशों में एलपीजी और पेट्रोल की मांग डीजल से ज्यादा हो गयी है. आंकड़े भी बताते हैं कि कोविड-19 के दौर में देश में रिकॉर्ड स्तर पर गाड़ियां बिकी हैं जिनमें पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों की संख्या सबसे ज्यादा है. विश्लेषकों के मुताबिक सऊदी अरब से कटौती करके अमेरिका, नाइजरिया, वेनेजुएला और अंगोला जैसे देशों से तेल खरीदने की एक प्रमुख वजह यह भी है.

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भारत द्वारा अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों से तेल खरीदने को कई जानकार स्थायी विकल्प के तौर पर नहीं देखते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका, वेनेजुएला और नाइजीरिया जैसे देशों से भारत की दूरी बहुत ज्यादा है इसलिए इन देशों से तेल मंगवाना उसे बहुत महंगा पड़ता है. इसके अलावा दक्षिण अमेरिकी और अफ़्रीकी देशों की परिस्थितियां ऐसी हैं कि वहां से बाधारहित आपूर्ति सुनिश्चित करना आसान नहीं है. उदहारण के तौर पर बीते महीने भारत ने दक्षिण अमेरिकी देश गुयाना से पहली बार कच्चा तेल खरीदना शुरू किया. लेकिन वहां से लंबे समय तक तेल की आपूर्ति जारी रह पाना मुश्किल है क्योंकि एक तो गुयाना से भारत की दूरी 15000 किमी है, और दूसरा यह दक्षिण अमेरिकी देश गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा है.

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