अमेरिका में प्रवासी भारतीय

विचार-रिपोर्ट | विदेश

कैसे अमेरिका में ‘ग्रीन कार्ड’ को लेकर पेश हुआ बिल भारतीयों के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है

अमेरिका में ग्रीन कार्ड जारी करने से जुड़े नियमों में बदलाव के लिए लाया जा रहा यह बिल वहां की संसद के निचले सदन में भारी बहुमत से पास हो गया है

अभय शर्मा | 24 जुलाई 2019 | फोटो : Indian-American Community / facebook

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अमेरिका में लंबे समय से ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीयों के लिए पिछले दिनों राहत की खबर आई. अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने प्रत्येक देश को ग्रीन कार्ड जारी करने की मौजूदा सात फीसदी की सीमा हटाने के लिए मंजूरी दे दी. इसे लेकर पास हुए विधेयक में प्रत्येक देश के लिए ‘परिवार आधारित ग्रीन कार्ड’ जारी करने की सालाना सीमा को सात फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया गया है. साथ ही रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए सात फीसदी की सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया.

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ग्रीन कार्ड किसी व्यक्ति को अमेरिका में स्थायी तौर पर रहने और काम करने की इजाजत देता है. अमेरिका में तीन साल से ज्यादा का समय बिता चुके लोग इसके लिए आवेदन कर सकते हैं. अमेरिकी सरकार हर साल रोजगार आधारित 1,40,000 ग्रीन कार्ड जारी करती है, जिनके लिए दुनियाभर के करीब दस लाख लोग आवेदन देते हैं. हर देश के लिए सात फीसदी कोटा होने के चलते ग्रीन कार्ड मिलने में सबसे ज्यादा परेशानी भारतीयों को होती थी. अमेरिका में हर साल ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वालों में 75 फीसदी से ज्यादा भारतीय ही होते हैं. लेकिन इनमें से दो फीसदी को भी ग्रीन कार्ड नहीं मिल पाता. एक रिपोर्ट की मानें तो इस समय छह लाख से ज्यादा भारतीय ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं.

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अमेरिका में ग्रीन कार्ड से जुड़े कानून में बदलाव के पक्षधर लोगों का कहना था कि हर देश के लिए सात फीसदी का कोटा सही नहीं है. उनके मुताबिक इससे भारत और चीन जैसे ज्यादा जनसंख्या वाले देशों के लोगों के साथ न्याय नहीं हो पाता. उदाहरण के तौर पर देखें तो आइसलैंड की जनसंख्या महज तीन लाख 38 हजार है और भारत की एक अरब से ज्यादा, लेकिन दोनों देशों को हर साल बराबर संख्या में ग्रीन कार्ड आवंटित होते हैं. इसलिए ज्यादा जनसंख्या वाले देशों के लिए ग्रीन कार्ड का कोटा बढ़ाने की मांग हो रही थी.

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अमेरिका में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए सात फीसदी की सीमा को पूरी तरह हटाए जाने का सबसे ज्यादा फायदा उच्च कौशल वाले भारतीय पेशेवरों को मिलेगा. इन लोगों को अमेरिका में काम करने के लिए अस्थायी एच1-बी वीजा की जरूरत होती है. लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप की ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ (अमेरिकी उत्पाद खरीदो, अमेरिकियों को नौकरी दो) नीति ने इन लोगों के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. इस नीति के बाद से भारतीयों के लिए एच1-बी वीजा खारिज होने की दर 20-40 फीसदी हो गयी है. भारतीयों को वीजा न मिलने के चलते तकनीक से जुड़ी अमेरिकी कंपनियां भी खासा परेशान हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर की तकनीक का केंद्र माने जाने वाले कैलिफोर्निया की कंपनियों में 70 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी विदेशी हैं और इनमें भी सबसे ज्यादा भारतीय हैं.

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हालांकि, अभी इस बिल को कानून में बदलने के लिए उच्च सदन यानी सीनेट और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हरी झंडी की जरूरत है. जानकारों की मानें तो यह बिल सीनेट में भी आराम से पास हो जाएगा क्योंकि डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के ही सांसद इसके पक्ष में हैं. उम्मीद ये भी जताई जा रही है कि अमेरिका की बड़ी आईटी कंपनियों के प्रमुखों द्वारा डोनाल्ड ट्रंप से अपील किए जाने के बाद, अब वे भी इसे नहीं रोकेंगे.

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