अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

अखिलेश यादव अगले विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी से गठबंधन क्यों नहीं करना चाहते?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी

अभय शर्मा | 23 नवंबर 2020 | फोटो: फेसबुक - अखिलेश यादव

1

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी. हालांकि, उनके मुताबिक सपा कुछ छोटे दलों से गठबंधन कर सकती है और चाचा शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को एडजस्ट करने पर विचार किया जाएगा. समाजवादी पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ और 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन किया था. लेकिन, इन दोनों ही पार्टियों के साथ उसे बुरा अनुभव मिला. 2017 के चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद उसकी सीटों की संख्या 224 से 47 पर आ गयी. यह पहली बार था, जब सपा को उत्तर प्रदेश में 50 से भी कम सीटें मिलीं. 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे 29 फीसदी से ज्यादा वोट मिला था. लेकिन 2017 में यह घटकर महज 21 फीसदी ही रह गया.

2

बीते लोकसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने बड़ी उम्मीदों के साथ बसपा से गठबंधन किया था. लेकिन चुनावों के नतीजों से साफ़ पता चलता है कि इस गठबंधन से केवल मायावती को ही फायदा हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती की बसपा को किसी भी लोकसभा सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. लेकिन 2019 में उसे दस सीटें हासिल हुईं और वह 23 सीटों पर दूसरे नंबर पर आने में सफल रही. बसपा ने जो दस सीटें जीती, उनमें सात ऐसी थीं जिन पर सपा की मदद के बिना जीतना सम्भव नहीं था. अगर, सपा की बात करें तो 2014 की तरह ही 2019 में भी उसे पांच सीटें ही हाथ लगीं. इनमें से तीन प्रत्याशी अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव और आजम खान जैसे दिग्गज नेता थे. इसके अलावा दो सीटें मुस्लिम बाहुल्य थीं. बीते लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन के बावजूद सपा का मत प्रतिशत 2014 की तुलना में पांच फीसदी घटकर 17 फीसदी पर आ गया, वहीं बसपा का मत प्रतिशत पहले की तरह ही 19 फीसदी से ज्यादा रहा.

3

उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस का गठबंधन काफी वोटरों के गले नहीं उतरा. लोग यह सवाल पूछते नजर आए कि आखिर अखिलेश यादव ने उस कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों किया जिसका राज्य में आधार न के बराबर ही बचा है? कांग्रेस की हालत यह थी कि गठबंधन में उसे 105 सीटें मिली थीं जिनमें से करीब आधी सीटों पर उसके पास अच्छे उम्मीदवार तक नहीं थे. इस वजह से उसकी 40 सीटों पर सपा के नेता ही चुनाव लड़े. सपा के एक नेता कांग्रेस के साथ गठबंधन की वजह बताते हुए कहते हैं, ‘उस समय सपा आंतरिक कलह से जूझ रही थी, शिवपाल सिंह यादव अलग हो चुके थे. इससे पार्टी की छवि को नुकसान हुआ और उसका जनाधार भी विभाजित हुआ. कांग्रेस से गठबंधन इस नुकसान की थोड़ी बहुत पूर्ति के लिए किया गया… 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 12 प्रतिशत वोट मिले थे, ये वोट अगर समाजवादी पार्टी को स्थानान्तरित हो जाते तो पारिवारिक अंतर्कलह, मुलायम सिंह यादव एवं शिवपाल यादव की नाराज़गी से सपा को जो हानि हुई, उसकी भरपाई संभव हो जाती… (सपा को कमजोर समझकर) मुस्लिम वोट बसपा की तरफ न जाए इसलिए भी गठबंधन जरूरी लगा.’ कुछ अन्य सपा नेता कहते हैं कि अब अखिलेश यादव के आगे ऐसी कोई मजबूरी नहीं है, इसलिए अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन नहीं होगा.

4

बीते लोकसभा चुनाव में बसपा की जीती सीटों के विश्लेषण से यह भी दिखता है कि उन सीटों पर सपा के अपने कमिटेड वोटरों ने बसपा को वोट देने में संकोच नहीं किया जबकि बसपा के मामले में ऐसा स्वाभाविक तौर पर नहीं हुआ. गठबंधन से बसपा को यह फायदा हुआ कि मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को कमजोर देखते हुए अपना वोट गठबंधन के पाले में डालना अधिक बेहतर समझा. कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि सपा और बसपा ने ऊपरी तौर पर तो गठबंधन कर लिया था और नेताओं के दिल भी मिल गए थे, लेकिन जमीन पर बात नहीं बनी. इन लोगों के मुताबिक दलित समुदाय के लोगों की जमीनी स्तर पर सबसे ज्यादा अदावत यादव समुदाय के लोगों से ही होती है. ऐसे में यादवों और जाटवों ने साथ आने की कोशिश भले ही की हो लेकिन वे पूरी तरह से ऐसा कर नहीं पाए. ऐसे में इन तबकों से आने वाले कई वोटरों ने भाजपा को वोट देना ज्यादा बेहतर समझा.

5

सपा के कुछ नेताओं की मानें तो 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद हाल में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ़ कर दिया है कि भाजपा के सामने चुनाव पूर्व गठबंधन बड़ी पार्टियों को मजबूत नहीं बल्कि कमजोर कर देता है. बिहार में महागठबंधन में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन केवल 19 सीट ही जीत पाई. राज्य के प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी ने 144 सीटों पर चुनाव लड़कर 75 पर जीत हासिल की. बिहार में छोटी पार्टियों में गिने जाने वाले वामदलों को महागठबंधन में 29 सीटें मिली थीं जिनमें 16 पर उनके उम्मीदवार जीते. इन नतीजों से साफ़ है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई. सपा के कुछ नेता यह भी कहते हैं कि यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की रणनीति भाजपा बनाम सपा का चुनाव बनाने की है. अगर चुनाव पूर्व गठबंधन किया गया तो यह रणनीति फेल हो जायेगी.

  • सैमसंग गैलेक्सी एस20

    खरा-खोटा | मोबाइल फोन

    सैमसंग गैलेक्सी एस20: दुनिया की सबसे अच्छी स्क्रीन वाले मोबाइल फोन्स में से एक

    ब्यूरो | 21 घंटे पहले

    डिएगो माराडोना

    विचार-रिपोर्ट | खेल

    डिएगो माराडोना को लियोनल मेसी से ज्यादा महान क्यों माना जाता है?

    अभय शर्मा | 26 नवंबर 2020

    निसान मैग्नाइट

    खरा-खोटा | ऑटोमोबाइल

    क्या मैगनाइट बाजार को भाएगी और निसान की नैया पार लगाएगी?

    ब्यूरो | 26 नवंबर 2020

    भारतीय पुलिस

    आंकड़न | पुलिस

    पुलिस हिरासत में होने वाली 63 फीसदी मौतें 24 घंटे के भीतर ही हो जाती हैं

    ब्यूरो | 25 नवंबर 2020