अरविंद केजरीवाल

विचार-रिपोर्ट | राजनीति

क्या दिल्ली से बाहर निकलकर एक वैकल्पिक पार्टी बनने की आप की संभावनाएं अब खत्म हो गई हैं?

2020 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व बनाए रखने की लड़ाई साबित हो सकते हैं

ब्यूरो | 27 मई 2019 | फोटो: अरविंद केजरीवाल

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आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के सिर्फ दो सालों के भीतर ही दिल्ली की सत्ता में प्रचंड बहुमत पाने में कामयाब हुई थी. इसके बाद कहा जाने लगा था कि वह दिल्ली से बाहर भी अपने पैर पसारेगी. पार्टी ने 2017 में होने वाले कुछ विधानसभा चुनावों में ऐसा करने के प्रयास भी किए. पंजाब में तो एक समय ऐसा लगा था कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा को हटाकर आप राज्य की बागडोर संभाल सकती है.

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पंजाब में आप को इसलिए भी उम्मीदें थीं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में उसने यहां की चार सीटों पर जीत हासिल की थी. इस बार भी पंजाब में ही आप को एक सीट मिली जबकि वो देश की 40 से अधिक सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ रही थी. आप को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद 2017 में हुए गोवा विधानसभा चुनावों में भी थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इस बीच हरियाणा और राजस्थान में भी आप संगठन विस्तार की कोशिश करती रही. लेकिन नतीजा शून्य ही रहा.

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इस सबके बीच यह लगता रहा कि कम से कम दिल्ली में आम आदमी पार्टी मजबूत है. इस बात के पक्ष में यह तर्क दिया जाता था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में केजरीवाल सरकार ने जो काम किए हैं, उसकी वजह से दिल्ली में उनकी राजनीतिक ताकत बनी हुई है.

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लोकसभा चुनावों के परिणामों ने आप की यह स्थिति भी कमजोर कर दी है. इन चुनावों में दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर न सिर्फ आम आदमी पार्टी हारी बल्कि सात में से पांच सीटों पर वह दूसरे नंबर पर भी नहीं रही. जबकि 2014 में सातों सीटें हारने के बावजूद वह इन सभी सीटों पर नंबर दो रही थी.

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लोकसभा चुनाव में मिले वोटों के हिसाब से देखें तो अगले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की 70 में से 65 सीटें भाजपा और पांच कांग्रेस को मिलती दिखती हैं. इस हिसाब से 2020 में आप का खाता भी खुलता नहीं दिख रहा है. यानी कि अब आप की पूरी जद्दोजहद दिल्ली का अपना किला बचाये रखने की होगी. न कि दिल्ली से बाहर अपना विस्तार करने की. क्योंकि अगर दिल्ली भी हाथ से चली गई तो आप और अरविंद केजरीवाल के पूरे राजनीतिक अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो सकता है.

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