अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है में मानव कौल, नंदिता दास

खरा-खोटा | सिनेमा

अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है: एक फिल्म जो आपको असल चुनावी मुद्दे बता सकती है

कलाकार: मानव कौल, नंदिता दास, सौरभ शुक्ला, किशोर कदम | लेखक-निर्देशक: सौमित्र रानाडे | रेटिंग: 3/5

ब्यूरो | 11 अप्रैल 2019

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साल 1980 में रिलीज हुई सईद अहमद मिर्ज़ा की कल्ट-क्लासिक ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ मज़दूर तबके से आने वाले एक नायक, अल्बर्ट पिंटो की कहानी कहती है. यह फिल्म उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने की पोल खोलती है. सच की जमीन पर कलात्मकता और सादगी से बुनी गई इस फिल्म को देखने और इसका कहा समझने के लिए आपको ढेर सारा धैर्य और संवेदना चाहिए होती है. इन दोनों चीजों की जरूरत तब भी होती है, जब आप 2019 में सौमित्र रानाडे निर्देशित ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ देखते हैं

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अल्बर्ट पिंटो चार दशक पहले तक अपनी परिस्थितियों से क्षुब्ध था और अब वह इनसे हताश हो चुका है. इतना हताश कि कई बार ऐसा लगता है जैसे वह अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठा है. पुरानी ‘अल्बर्ट पिंटो…’ से अलग नई फिल्म सामाजिक से ज्यादा मानवीय पक्ष दिखाती है. भीतर चलने वाले अच्छे-बुरे का द्वंद दिखाते हुए यह कई बार जरूरत से ज्यादा सिनेमाई हो जाती है. बार-बार काल्पनिक दृश्यों या फ्लैशबैक के चक्कर लगाते हुए यह अपनी लय तो नहीं खोती है लेकिन आपके पूरे ध्यान की दरकार बनाए रखती है.

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अल्बर्ट पिंटो बनकर, मानव कौल ने एक ईमानदार, नौकरीपेशा, मध्यवर्गीय लेकिन जिंदगी से अचानक उखड़ चुके युवक की भूमिका निभाई है. उनके अभिनय की खास बात यह है कि उनकी हंसी में उनके किरदार के भीतर की चिढ़न, गुस्से में मजबूरी और बौखलाहट में प्यार साफ-साफ देखा जा सकता है. मतलब यह है कि वे चेहरे पर, एक्सप्रेशन्स का ऐसा कॉकटेल दिखाते हैं कि आप वाह-वाह कहते न थकते हैं. बाकी स्क्रीन पर सजीले तो वे हमेशा ही लगते हैं.

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मानव कौल के अलावा जो अभिनेता सबसे ज्यादा वक्त परदे पर नज़र आता है, वे सौरभ शुक्ला हैं. शुक्ला जी ने इस बार बखूबी हरियाणवी टोन अख्तियार की है. इस टोन और निपट देसी शब्दों के साथ, उन्होंने कुछ कमाल संवाद कहे हैं. इन्हें लिखने के लिए हमें संवाद लेखक का और पूरा असर पैदा कर सकें इस तरह से निभाने के लिए लेखक को सौरभ शुक्ला धन्यवाद करना चाहिए. नायिका स्टेला के किरदार जो मूल फिल्म में शबाना आज़मी ने निभाया था, फिल्म में खटकने की हद तक संक्षिप्त रखा गया है. और इसीलिए नंदिता दास के बढ़िया अभिनय की झलक बस बीच-बीच में ही मिल पाती है.

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‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ की सिनेमैटोग्राफी कुछ ऐसी है कि इसे देखते हुए थिएटर देखने का अनुभव होता है. कई दृश्य, जिनमें नायक अपनी कल्पनाओं में उड़ता दिखता है, अपनी लिखाई और सुंदरता से प्रभावित करते हैं. कई ऐसे भी हैं जो अपने औसतपन से चिढ़ा भी देते हैं. यह फिल्म सीपिया येलो और डार्क शेड्स लिए हुए एक आम भारतीय की निराशाओं में गहरी उतरती है और इसीलिए चुनावी मौसम में एक देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है.

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