रोमियो अकबर वॉल्टर में जॉन अब्राहम

खरा-खोटा | सिनेमा

रोमियो अकबर वॉल्टर: काश, जॉन अब्राहम अपने चेहरे का भी थोड़ा व्यायाम कर लेते!

कलाकार: जॉन अब्राहम, जैकी श्रॉफ, सिकंदर खेर, मौनी रॉय | निर्देशक: रॉबी ग्रेवाल | लेखक: रॉबी ग्रेवाल, राहुल सेन गुप्ता | रेटिंग: 2/5

ब्यूरो | 06 अप्रैल 2019

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जॉन अब्राहम स्टारर रोमियो अकबर वॉल्टर में निर्देशक रॉबी ग्रेवाल विदेशी जासूसी थ्रिलर फिल्मों के सबसे सरल और जैनेरिक टेम्पलेट का इस्तेमाल करते हैं. वे उसके इर्द-गिर्द ही बेहद गंभीरता से अपनी कहानी बुनते हैं और जासूसी के तमाम फिल्मी, गैर-फिल्मी तौर-तरीकों को दिखाने के प्रति हद से ज्यादा प्रतिबद्ध दिखते हैं.

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दिक्कत यह है कि फिर भी इस फिल्म में उस तरह के थ्रिल की मौजूदगी नहीं मिलती, जिसकी उम्मीद आपको एक समझदार जासूसी थ्रिलर फिल्म से हमेशा रहती है. उम्दा प्रोडक्शन डिजाइन और सिनेमेटोग्राफी की मदद से निर्देशक 70 के दशक का विश्वसनीय माहौल रचने में तो सफल हो जाते हैं, लेकिन अपनी बेहद धीमी रफ्तार वाली फिल्म की लिखाई में उस स्तर की मेहनत नहीं करते कि वह रहस्य और रोमांच से लबरेज हो सके.

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रॉ के जासूस रहे रवींद्र कौशिक के कठिन जीवन को आधार बनाकर रची गई इस फिल्म में बेहद लंबा समय बिल्ड-अप के लिए लिया जाता है और दर्शकों को दाएं-बाएं, राउंड एंड राउंड खूब घुमाया जाता है. लेकिन आखिर में जब रहस्य से परदा हटता है तो फिल्म खोदा पहाड़ निकला चूहा वाली वीरगति को प्राप्त होती है.

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अभिनय की बात करें तो फिल्म में जॉन अब्राहम को देखकर यह सवाल पूछने का मन करता है कि वे अपने चेहरे का व्यायाम करना कब शुरू करेंगे! उनके काठ-से अभिनय के चलते न तो रॉ के नायक के आंतरिक द्वंद्व बाहर आ पाते हैं, न ही किरदार को वे हाथ भर भी भावनात्मक गहराई दे पाते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस जरूर प्रभावी है लेकिन भावशून्य चेहरे के साथ इस स्क्रीन प्रेजेंस का क्या किया जाए!

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जॉन के साथ बैंक में काम करने वाली मौनी रॉय को फिल्म ज्यादा कुछ करने के मौके नहीं देती और वे भी उतने में ही खुश नजर आती हैं. सिकंदर खेर पाकिस्तान का स्थानीय लहजा बखूबी पकड़ते हैं और अपने ग्रे शेड वाले पाकिस्तानी किरदार में प्रभावित करते हैं. वहीं रॉ चीफ के रोल में जिस तरह के रहस्यमयी आभामंडल की जरूरत थी, जैकी श्रॉफ वैसा ही आभामंडल बड़ी कुशलता से परदे पर रचते हैं. फिल्म में उनका अभिनय निस्संदेह उम्दा है.

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