मोगली: लेजेंड ऑफ द जंगल

खरा-खोटा | सिनेमा

एक फिल्म जो यह यकीन तक नहीं दिला पाती कि जंगल ही ‘मोगली’ का घर है

एंडी सर्किस निर्देशित ‘मोगली: लेजेंड ऑफ द जंगल’ रुडयार्ड किपलिंग की ‘द जंगलबुक’ से केवल जंगल का डर उठा पाती है, उसकी खूबसूरती नहीं

ब्यूरो | 10 दिसंबर 2018

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वॉर्नर ब्रदर्स की फिल्म ‘मोगली’ को नेटफ्लिक्स द्वारा खरीदे जाने की खबर आते ही इसकी तुलना 2016 में आई डिज्नी की ‘द जंगल बुक’ से होना शुरू हो गई थी. इन दोनों फिल्मों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि जंगल बुक जहां हर उम्र के बच्चों के लिए बनाई गई मासूमियत भरी फिल्म थी, वहीं मोगली: लेजेंड ऑफ द जंगल  13 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों के लिए रची गई थ्रिलर फिल्म है. इस डिस्क्लेमर के बावजूद एंडी सर्किस निर्देशित यह फिल्म इस तोहमत से बच नहीं सकती कि इसने ‘द जंगलबुक’ रचने वाले रुडयार्ड किपलिंग की लेगेसी पर बट्टा लगाया है.

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मोगली की सबसे बड़ी खामी, जो पहले ही दृश्य से आपको खटकने लगती है, वो ये है कि फिल्म में जंगल का डरावनापन तो खूब है लेकिन इसकी खूबसूरती जरा भी नहीं है. फिल्म से वे फ्रेम नदारद हैं जो बहती नदी, उछलकूद करते खरगोशों, पक्षियों के उड़ते झुंडों को दिखाकर जंगल के उस खुशहाल मिजाज की झलक दे पाते, जिस पर खतरे की बात फिल्म आगे करने वाली है.

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दूसरे नंबर पर मोगली को जंगल का कम और बस्ती का ज्यादा बताने का पाप भी फिल्म करती है. यह मोगली न तो इन जंगलों से इतना वाबस्ता है और न ही जंगली जानवर इसके इतने करीब. ऐसा लगता है कि फिल्म ने केवल जंगली जानवरों के नाम जंगल बुक से उठाए हैं क्योंकि इन किरदारों की पहचान बन चुकी खासियतें वहीं छोड़ दी हैं. ऐसा होना भी मोगली, जंगल और जानवरों के बीच गहरा कनेक्शन ना दिखाई देने की एक बड़ी वजह लगता है.

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संवादों और वॉइसओवर पर आएं हिंदी में डबिंग के लिए जो अनुवाद किया गया है, वह किसी अकादमिक इबारत को बांचे जाने सा लगता है. माधुरी दीक्षित, करीना कपूर खान, जैकी श्रॉफ, बनकर अनिल कपूर और अभिषेक बच्चन जैसे सितारों की काम भी प्रभावी और चुटीली लाइनों की कमी के चलते रोमांचकारी के बजाय सिर्फ अच्छा होकर रह जाता है. इसके अलावा बुरा यह है कि मोगली बनकर दिखे रोहन चंद न सिर्फ अपने एक्सप्रेशंस बल्कि अपने लुक से भी ज्यादातर वक्त ऐसे लगते हैं जैसे किसी शहर से लाकर जंगल में छोड़ दिए गए हों.

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फिल्म की इकलौती और बेहतरीन खूबी की बात करें तो ‘मोगली’ जानवरों का संवेदनशील होना दिखाने से भले ही चूक गई, लेकिन इंसान का जानवर-पन एकदम सटीक तरीके से दिखाती है. साथ ही, यह भी बताती है कि इंसान की गलतियों की सजा जहां कुदरत उसे सालों बर्दाश्त करने के बाद देती है, वहीं किसी जानवर की गलती का फैसला इंसान तुरंत कर देना चाहता है. करीब पौने दो घंटे लंबी यह फिल्म आदिम बनाम आदमी की जंग का बेहद जरूरी किस्सा कहते हुए भी, जंगल के अंधेरों और उस अंधेरे में पनपे डर के बोझ तले दब जाती है. और आखिर में यह यकीन दिलाने से चूक जाती है कि जंगल ही मोगली का घर है.

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