कलंक में वरुण धवन और आलिया भट्ट

खरा-खोटा | सिनेमा

कलंक: एक भव्य फिल्म जिसमें देखने लायक सिर्फ आलिया भट्ट और वरुण धवन का अभिनय है

कलाकार: आलिया भट्ट, वरुण धवन, माधुरी दीक्षित, सोनाक्षी सिन्हा | निर्देशक: अभिषेक वर्मन | लेखक : शिबानी भटिजा, हुसैन दलाल | रेटिंग : 2/5

ब्यूरो | 18 अप्रैल 2019

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अभिषेक वर्मन निर्देशित पीरियड ड्रामा ‘कलंक’ पर संजय लीला भंसाली के सिनेमा का जबरदस्त प्रभाव दिखता है. साथ ही फिल्म में ट्रू-लव की वह अतिनाटकीयता भी मौजूद है जो आमतौर पर करण जौहर की फिल्मों में होती है. इसके अलावा ‘कलंक’ राजामौली निर्देशित ‘बाहुबली’ जैसे विहंगम विजुअल्स रचने की महत्वाकांक्षा भी रखती है. इस तरह एक सुंदर सिनेमा, जो रक्तरंजित प्रेम की उम्दा कथा हो सकता था, एक सजावटी सामान बन जाता है.

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अपने मुख्य पात्रों के बीच ‘कलंक’ जिस तरह के रिश्तों को एक्सप्लोर करने की कोशिश करती है, उस तरह की कहानी कहने के लिए इसे आमिर खान की फिल्म ‘1947 अर्थ’ जैसी सेंसिबिलिटी और मारकता की जरूरत थी. लेकिन ‘कलंक’ पार्टीशन की टेक भर लेकर, मेलोड्रामा से भरी अपनी औसत त्रिकोणीय प्रेम कहानी को ज्यादा तवज्जो देती है.

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अभिनय की बात करें तो आदित्य रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा और संजय दत्त औसत से बेहतर काम तो करते हैं लेकिन यादगार रह जाए ऐसा बिलकुल नहीं. माधुरी दीक्षित प्रभावित करती हैं और वरुण धवन के मुस्लिम दोस्त की भूमिका में कुणाल खेमू गजब का काम करते हैं.

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आलिया भट्ट शुरुआत में तो पीरियड-ड्रामा की परिधि वाले अपने पारंपरिक किरदार में नहीं जंचती हैं. लेकिन जल्दी ही देखने वालों को गलत ठहराते हुए फिल्म को अपने कंधों पर उठा लेती हैं. उनकी वृहद इमोशनल रेंज इस किरदार के भी बहुत काम आती है.

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‘कलंक’ से सबसे ज्यादा फायदा वरुण धवन को होने वाला है. हालांकि उनके किरदार की बुनाई अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘त्रिशूल’ जैसी हिंदी मसाला फिल्मों के आसपास की ही है लेकिन इसे वे अपने समर्पित अभिनय और आक्रोश को कुशल अभिव्यक्ति देकर ऐसे किरदार को जीवंत कर देते हैं. ‘कलंक’ में अगर कोई काजल है तो वो वरुण धवन ही हैं. बाकी तो, दो घंटे 48 मिनट की यह बेहद लंबी और उबाऊ फिल्म असल में कोयला है!

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