ठाकरे में नवाजुद्दीन सिद्दीकी

खरा-खोटा | सिनेमा

ठाकरे: जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी का होना भी अखरता है

कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अमृता राव | निर्देशक: अभिजीत पानसे | लेखक: संजय राउत, अभिजीत पानसे | रेटिंग: 1/5

ब्यूरो | 25 जनवरी 2019

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इस हफ्ते रिलीज हुई ठाकरे नाम की बायोपिक के बारे में सीधे-साफ कहें तो ये एक विशुद्ध प्रोपेगेंडा फिल्म है. शिवसेना सांसद संजय राउत ने इसका निर्माण किया है और निर्देशन करने वाले अभिजीत पानसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से हैं! ये फिल्म शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का अविरल स्तुतिगान करती है, और केवल उन लोगों को रास आएगी, जो कि शिवसेना की विचारधारा में यकीन रखते हैं.

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‘ठाकरे’ की शुरुआत और अंत बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की अदालती सुनवाई से होता है. इसमें बाल ठाकरे किसी महानायक की तरह बाबरी मस्जिद गिराए जाने को बढ़-चढ़कर जस्टीफाई करते हैं. जबकि वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन की बेहतरीन किताब – ‘हिंदू हृदय सम्राट – हाउ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फॉरएवर’ – बताती है कि ठाकरे को जेल जाने से बहुत डर लगता था इसलिए न सिर्फ उन्होंने इमरजेंसी का सपोर्ट किया बल्कि अदालत का समन आते ही अपने इस बयान से भी पलट गए कि बाबरी मस्जिद शिवसैनिकों ने गिराई है.

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फिल्म में कहीं भी बाल ठाकरे की छवि को बदलकर उन्हें नरम नेता की तरह पेश करने की कोशिश नहीं हुई है, बल्कि ठाकरे अपने कट्टरवाद को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आती है. शिव सैनिकों द्वारा हिंसा किए जाने वाले दृश्यों को इसमें बार-बार महिमामंडित किया जाता है और उनके द्वारा बाल ठाकरे के विरोधियों की हत्या तक करने को, आराम से दिखा दिया जाता है.

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बाल ठाकरे के कई मोनोलॉग फिल्म में हैं, जो कि ‘सामना’ में लिखे उनके संपादकीय की तरह ही विवादास्पद बातें करते हैं. लोकतंत्र में विश्वास न रखने से लेकर हिटलर जैसा होने की उनकी ख्वाहिश तक को फिल्म में जोर-शोर से रेखांकित किया गया है. दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाने के लिए दिए उनके नारे से लेकर एंटी-मुस्लिम बातें भी ठाकरे में खूब कहीं गई हैं. और यह समझने की कोशिश में सर चकरा जाता है कि मुस्लिम अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने ऐसे संवादों को स्वीकार कैसे किया होगा!

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ठाकरे में मुख्यत: दो ही कलाकार हैं. अमृता राव बाल ठाकरे की धर्मपत्नी मीना ताई के रोल में हैं और गरिमापूर्ण अभिनय करती हैं. वहीं, नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बार फिर उम्दा अभिनय करते हैं. उनकी न तो आवाज बाल ठाकरे से मिलती है और न चेहरा लंबा है, लेकिन वे ऐसे अनोखे अभिनेता हैं जो किसी भी शख्सियत के रूप में ढलते वक्त भी खुद को ढेर सारा बचा लेते हैं. वे ऐसी नकल कभी नहीं करते कि इमीटेशन लगे. वे मैनरिज्म सीखने के बाद किरदार की रूह पकड़ते हैं और उस पर शरीर अपना सिल देते हैं. बस, कभी-कभी ये भूल जाते हैं कि नफरत बोने-उगाने वाली प्रोपेगेंडा फिल्मों और ‘मंटो’ में अंतर होता है!

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