नो फादर्स इन कश्मीर

खरा-खोटा | सिनेमा

नो फादर्स इन कश्मीर: जो उतनी ही उलझी है जितने वादी के मसाइल

कलाकार: ज़ारा वैब, शिवम रैना, अश्विन कुमार, सोनी राज़दान, कुलभूषण खरबंदा, अंशुमान झा | लेखक/निर्देशक: अश्विन कुमार | रेटिंग: 3/5

ब्यूरो | 06 अप्रैल 2019

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‘नो फादर्स इन कश्मीर’ 2017-18 की तीन बेहतरीन फ़िल्मों की याद दिलाती है, नॉर्वेजियन-पाकिस्तानी निर्देशक इरम हक़ की ‘वॉट विल पीपल से’ जर्मन निर्देशक टोबायस वाइमैन की ‘माउंटेन मिरेकल-एन अनएक्सपेक्टेड फ़्रेंडशिप’ और स्पैनिश फ़िल्म ‘टू लेट टू डाइ यंग.’ कश्मीर समस्या की बात करने की तमाम कोशिश के बावजूद यह फ़िल्म इन तीनों फ़िल्मों का ऐसा कॉकटेल बन जाती है जिसे पीने वाला तय नहीं कर पाता कि किस स्वाद पर ठहरा जाए!

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लेखक, निर्देशक, प्रोड्यूसर और टॉर्चर के बाद पुरुषत्व खो चुके मौक़ापरस्त जिहादी समेत चार भूमिका निभाने वाले अश्विन कुमार का नाम आपको पहले ही यह उम्मीद दे चुका होता है कि फ़िल्म में आपको फ़िल्मी नहीं, असली कश्मीर देखने को मिलेगा. कश्मीर पर ‘इंशाअल्लाह कश्मीर’ और ‘इंशाअल्लाह फ़ुटबॉल’ नाम से बेहतरीन डॉक्युमेंटरीज़ बना चुके अश्विन इस मामले में निराश नहीं करते. उन्होंने कश्मीर को ज़मीन से समझा है, और फ़िल्म इस बात की बानगी है.

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निर्देशक उन हज़ारों परिवारों का दर्द दिखाने की कोशिश करता है जिनके गुमशुदा बेटों, पतियों और पिताओं का आज़ तक पता नहीं चल सका है, ज़िंदा हैं भी या नहीं. यहां उन सवालों पर भी रौशनी डालने की कोशिश की गई है, जो घाटी में लगभग सबके सवाल होने पर भी पूछे नहीं, सिर्फ समझे जाते हैं. पैट्रो-डॉलर्स पर खुलते मदरसों, मस्जिदों की बात उठाई जाती है और उन लोगों की भी जो एक तरफ़ हिंदुस्तान से कश्मीर की आज़ादी मांगते हैं और दूसरी तरफ़ हिंदुस्तानी सेना से पैसा लेकर मुखबिरी करते हैं.

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अभिनय और किरदारों की बात की जाए तो नूर के किरदार में ज़ारा वैब काफी प्रभावित करती हैं. पहले हाफ में मुश्किल से आगे बढ़ती फ़िल्म में उनका अभिनय हमें फ़िल्म से बांधे रखता है. माजिद की भूमिका निभाते शिवम भी संभावनाओं से भरे हुए हैं. जितने समय नूर और माजिद पर्दे पर साथ रहते हैं, हम उन्हें और देखना चाहते हैं. वहीं फ़िल्म कुलभूषण खरबंदा, सोनी राज़दान जैसे मंझे हुए अभिनेताओं की पर्दे पर मौजूदगी से न्याय नहीं कर पाती.

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‘नो फादर्स इन कश्मीर’ की सिनेमेटोग्राफ़ी औसत है. फ़िल्म में वूंटकदल के नीचे से नाव ले जाने का दृश्य देखते हुए आप पिछले हफ़्ते आई नोटबुक की ख़ूबसूरत सिनेमेटोग्राफ़ी को याद किए बिना नहीं रह पाते. कुल मिलाकर कहा जाए तो घाटी के हालात बयान करती इस फ़िल्म की हालत घाटी जैसी ही हो जाती है जहां सबकुछ इतना गड्ड-मड्ड हो चुका है कि आखिर आप पहुंचना कहां चाहते हैं, समझना मुश्किल नज़र आने लगता है.

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