लुका-छुपी में कृति सेनन और कार्तिक आर्यन

खरा-खोटा | सिनेमा

लुका-छुपी: जो लिव-इन रिलेशनशिप के छोटे शहर पहुंचने का एक मनोरंजक किस्सा दिखाती है

लेखक: रोहन शंकर | निर्देशक: लक्ष्मण उटेकर | कलाकार: कार्तिक आर्यन, कृति सेनन, विनय पाठक, अपारशक्ति खुराना, पंकज त्रिपाठी | रेटिंग: 2.5/5

ब्यूरो | 01 मार्च 2019

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‘लुका-छुपी’ लिव इन रिलेशनशिप में जाने वाले एक जोड़े की कहानी दिखाती है और मथुरा और ग्वालियर जैसे छोटे-छोटे शहरों को इसकी पृष्ठभूमि में रखकर अपने होने की वजह को खास बनाती है. यहां पर यह कभी ग्वालियर के खूबसूरत महलों तो कभी मथुरा की तंग गलियों में इश्क को परिवार, समाज और राजनीति से सही मायनों में आंख-मिचौली खेलते दिखाती है.

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फिल्म ठीक वैसे ही कई नजारे पेश करती है, जैसे कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की गलियों में तहलका मचाने वाले ‘एंटी रोमियो दल’ ने दिखाए थे. यह मजेदार है कि इस गैंग को ‘संस्कृति रक्षा दल’ नाम देकर फिल्म यह साफ भी कर देती है कि उसका निशाना सिर्फ एंटी रोमियो राजनीति करने वालों पर नहीं है.

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‘लुका-छुपी’ की एक बिना छुपी इच्छा मनोरंजक, कॉमिक ड्रामा बनने की लगती है. हालांकि यह अपने ड्रामा से मनोरंजन तो करती है लेकिन कॉमेडी फिल्म बनने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाती. पहले हिस्से में जो सिचुएशन्स, सपाट संवादों के साथ भी मज़ेदार लगती हैं, इंटरवल तक इतनी बार दोहराई जा चुकी होती हैं कि मजा आना बंद हो जाता है. इसके बावजूद पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक और अपारशक्ति खुराना जैसे अभिनेताओं का बढ़िया अभिनय और सुंदर फिल्मांकन इसे बोझिल होने से बचाए रखता है.

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कार्तिक आर्यन अपनी पिछली फिल्मों की स्केल का ही अभिनय करते हैं. बस, इस बार मथुरा के बनकर ब्रजभाषानुमा कोई जुबान बोलने की कोशिश करते हैं जो बिगड़ी हुई हिंदी बनकर उनसे बिगड़ी यानी रूठी हुई लगने लगती है.  बेहद सुंदर शरीर की मालकिन कृति सेनन भी सेफ ज़ोन में ही रहकर काम करती हैं लेकिन छोटे शहर की, दिल्ली रिटर्न लड़की बनकर वे जिस कॉन्फिडेंस और एक्सेंट के साथ बात करती हैं, उससे मोहित करती हैं.

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बॉलीवुड की कई हिट फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी करने वाले लक्ष्मण उटेकर ने इस फिल्म से बतौर निर्देशक बॉलीवुड में कदम रखा है. इसके पहले ‘लुका-छुपी’ के पटकथा लेखक रोहन शंकर के साथ वे एक मराठी फिल्म ‘लालबागची रानी’ बना चुके हैं, जो कम ही लोगों तक पहुंच सकी लेकिन सराही गई थी. फिलहाल, माहौल के हिसाब से रची गई उनकी यह सुंदर पॉलिटिकल प्रेम कहानी प्यार और रिश्तों को ‘मुद्दा’ न बनाने की बढ़िया सी बात, जरा हल्के-फुल्के तरीके से कह जाती है.

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