'दुर्गामती - द मिथ' में भूमि पेडनेकर

खरा-खोटा | सिनेमा

‘दुर्गामती – द मिथ’ के बारे में 5 फिल्म समीक्षाएं क्या कहती हैं?

कलाकार: भूमि पेडनेकर, अरशद वारसी, जिशु सेनगुप्ता, माही गिल | निर्देशक: जी अशोक | औसत रेटिंग: 1/5 | प्लेटफॉर्म - एमेजॉन प्राइम

ब्यूरो | 12 दिसंबर 2020

1

इंडियन एक्सप्रेस: (डेढ़ स्टार)

निश्चित रूप से वास्तविकता कई बार कल्पना से विचित्र हो सकती है और दुनिया में तमाम ऐसी चीजें हैं जिन्हें समझ पाना संभव नहीं है. हॉरर-थ्रिलर फिल्में यही सब दिखाती हैं और अगर आप (फिल्मकार) इस रास्ते जाना चाहते हैं तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि देखने वाले जो हो रहा है उस पर यकीन करें, पूरी तरह से और बिना कोई सवाल किये. लेकिन तमिल और तेलुगू में बनी भागमती के उसी के निर्देशक द्वारा बनाये गये इस रीमेक – ‘दुर्गामती – द मिथ’ – में रोमांच और डर की मात्रा शून्य है. बल्कि करीब ढाई घंटे तक खिंचने वाली इस फिल्म में लगभग हर समय ही हंसी आती रहती है.

2

एनडीटीवी: (एक स्टार)

‘दुर्गामती – द मिथ’ में इतनी ज्यादा चीजें हैं कि यह उन्हें संभाल ही नहीं पाती है. मंदिरों से प्राचीन मूर्तियां गायब हो रही हैं. लॉ-एन्फोर्समेंट एजेंसियों पर इसकी जांच के लिए ऊपर से बहुत दबाव है. दोषियों को पकड़ने का मिशन, एक ऐसी साजिश में बदल जाता है जिसका शिकार एक इतना साफ-सुथरा नेता कि उसे भगवान का अवतार माना जा सकता है. इसके बाद मनोरंजन के नाम पर फिल्म में तमाम तरह की बकवास चीजें दिखाई जाती हैं. कुल मिलाकर बिना रुके लगातार बकवास करने वाली यह फिल्म सिर्फ झेली न जा सकने वाली चिढ़न ही पैदा करती है.

3

हिंदुस्तान टाइम्स (एक स्टार)

भूमि पेडनेकर के बेहद प्रतिभाशाली होने के बावजूद – उन्होंने लस्ट स्टोरीज और सोनचिड़िया में बेहद कमाल का काम किया था – इस फिल्म में उनका अभिनय अच्छा नहीं है. जब वे सपाट चेहरे वाली गंभीरता के साथ चंचल/दुर्गामती का किरदार निभा रही होती हैं, तब उनके आसपास सबकुछ किसी कार्टून फिल्म सरीखा लगता है. फिल्म को संतुलित बनाना एक फिल्मकार का काम होता है, लेकिन निर्देशक अशोक की अक्षमता के चलते पेडनेकर यहां बहुत अजीब सी लगती हैं.

4

द हिंदू

एकमात्र चीज जो ‘दुर्गामती – द मिथ’ को जीवंत बनाती है, वह इसकी बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी है. मध्य प्रदेश के अंदरूनी इलाकों और भुतहा हवेली के विजुअल्स ऐसा कमाल का माहौल रचते हैं कि वह डर से खून जमा देने वाली किसी कहानी के लिए वरदान साबित हौ सकता था. फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन के साथ-साथ इसका आर्ट डायरेक्शन भी बेहतरीन क्वालिटी का है जो एक आलीशान घर के खंडहर की सुंदरता को बेहद कुशलता और संपूर्णता के साथ परदे पर लाता है.

5

द क्विंट (एक स्टार)

‘दुर्गामती’ की एक खास बात यह है कि यह शुरूआत के दस मिनट में ही आपको इस बात का एहसास करवा देती है कि आपने गलती कर दी है… आखिर में हमें पता चलता है कि हॉरर फिल्में नहींबल्कि वे फिल्में डरावनी होती हैं जो इस जॉनर में जबरन फिट होने की कोशिश करती हैं. इस मामले में ‘दुर्गामती’ अक्षय कुमार की फिल्म ‘लक्ष्मी’ की टक्कर की है. क्या कोरोना वायरस और यह मनहूस साल कोई कम बुरे थे जो अब हमें दक्षिण भारतीय फिल्मों के वाहियात रीमेक भी देखने पड़ रहे हैं?

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