लता मंगेशकर और दिलीप कुमारलता मंगेशकर और दिलीप कुमार

खरा-खोटा | जन्मदिन

एक गाना जो गायक दिलीप कुमार से आपका परिचय करवाता है

दिलीप कुमार ने बेहद सुरीला यह गाना सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ गाया है

ब्यूरो | 11 दिसंबर 2018 | फोटो: यूट्यूब

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1957 में निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ रिलीज हुई थी. इसके नायक दिलीप कुमार और नायिका सुचित्रा सेन थीं. इस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसमें नायक नहीं बल्कि गायक दिलीप कुमार का होना था. इस फिल्म में संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के कहने पर उन्होंने एक पूरा क्लासिकल गीत गाया था – ‘लागी नाहीं छूटे, चाहे जिया जाए’.

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‘लागी नाहीं छूटे’ एक युगल गीत था जिसमें दिलीप कुमार की सहयोगी गायिका लता मंगेशकर थीं. इसे गाना बेहद मुश्किल इसलिए भी था क्योंकि इसमें ज्यादातर समय वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल न के बराबर किया गया है.

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गाने से जुड़ा किस्सा कुछ यूं है कि एक बार फिल्म के सेट पर दिलीप साहब अपनी धुन में कुछ गुनगुना रहे थे. उसे सुनकर सलिल चौधरी जैसे संगीतकार इतने प्रभावित हुए कि उनसे एक गाना गंवाने की जिद कर बैठे.

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राग आधारित यह गीत अगर आप सुनें तो खुद ही समझ जाएंगे कि शैलेंद्र के लिखे इन बोलों को दिलीप साहब ने सुर में रहते हुए क्या खूब गाया है. और हां, उस दौर में ऑटो-ट्यून नहीं था कि खराब आवाज को आज की तरह मधुर बना देता.

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इस क्लासिकल गीत को सुनने पर साफ जाहिर होता है कि दिलीप साहब के पास अद्भुत अभिनय के अलावा एक नेचुरल सिंगर वाला कमाल का गला भी था. यह और बात है कि ऐसी मधुर और सधी आवाज का फिर कभी इस्तेमाल नहीं किया गया.

सत्याग्रह की रिपोर्ट पर आधारित

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