बॉम्बैरिया में राधिका आप्टे

खरा-खोटा | सिनेमा

बॉम्बैरिया: जिसे देखकर ‘भसड़’ के अलावा कोई और शब्द दिमाग में नहीं आता!

कलाकार: राधिका आप्टे, अक्षय ओबेरॉय, आदिल हुसैन, रवि किशन | निर्देशक: पिया सुकन्या | रेटिंग: 2/5

ब्यूरो | 18 जनवरी 2019

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‘बॉम्बैरिया’ के खत्म होते ही आप खुद से पहला सवाल पूछते हैं कि आखिर यह क्या था, तो जवाब मिलता है भसड़. इस भसड़ यानी अराजकता का अपना सौंदर्य तो होता है लेकिन उसकी अपनी सीमाएं भी होती हैं. यही वजह है कि ‘बॉम्बैरिया’ सिनेमा के ज्यादातर पैमानों पर खरी नहीं उतर पाती है.

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दो घंटे से दस मिनट कम लंबाई वाली ‘बॉम्बैरिया’ चौंकाती है, हंसाती है, डराती भी है और फिर कुछ मौकों पर बोर भी कर देती है. लेकिन अपने बारे में नहीं बताती कि यह किस जॉनर की फिल्म है. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह मनोरंजक नहीं है या देखे जाने लायक नहीं है, बस भीड़ से अलग है.

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फिल्म में ढेर सारा ‘केओस’ है. मसलन राजनीति, फिल्म इंडस्ट्री, मुंबई शहर और घर-परिवार-समाज यानी सब तरह की बातें हैं. कुल मिलाकर मुंबई शहर के नाम से आपको जो कुछ भी याद आता हो, वह सब कुछ यहां है. इन सबसे उपजे शोर को आप क्या, कब, कैसे, कहां और क्यों जैसे बहुत सारे सवालों के साथ परदे पर आते-जाते देखते रहते हैं.

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अभिनय पर आएं तो आदिल हुसैन सारे वक्त लगभग एक ही फ्रेम में रहने के बावजूद आपका पूरा ध्यान खींचते हैं. वहीं, पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ से हैरान-परेशान पीआर बनकर राधिका आप्टे इस गड्ड-मड्ड कहानी में भी मिसफिट नहीं लगतीं हैं. इन दोनों के अलावा रवि किशन, अमित सियाल और अक्षय ओबेरॉय भी अपने-अपने हिस्से का शोर पैदाकर पर्याप्त ध्यान खींचते हैं.

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बॉम्बैरिया से बतौर निर्देशक डेब्यू कर रही पिया सुकन्या की यह फिल्म अपने आखिरी चौथाई हिस्से में इंसानों के आपसी कनेक्शन की फिलॉसफी का जिक्र करती है. इसके साथ ही गवाहों की सुरक्षा पर बने कानून पर कॉमेंट भी करती है. लेकिन पूरी फिल्म पर लागू ना होने के चलते ये बातें जरा कम ही समझ आती हैं. और इस तरह बॉम्बेरिया एक बढ़िया आइडिया पर बनी सार्थक मनोरंजक फिल्म बनने से पहले ही खत्म जाती है.

  • मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा

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