नरेंद्र मोदी और अमित शाह

रिपोर्ट | भाजपा

पांच दांव जो मोदी-शाह 2019 में भाजपा की जीत पक्की करने के लिए चल सकते हैं

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली हार ने भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में वह अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर सकता है

ब्यूरो | 21 दिसंबर 2018 | फोटो: तरुण चुग-ट्विटर

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एनडीए का विस्तार

2014 के चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद एनडीए की अहमियत कम हो गई. आम धारणा यह है कि सहयोगी दलों की सरकार में बहुत चलती नहीं है. इससे उनमें लगातार असंतोष बना रहा है. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा एनडीए से अलग हो गई हैं. शिव सेना और लोक जनशक्ति पार्टी भी उसके खिलाफ मुखर हैं. ऐसे में जानकारों का मानना है कि अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह 2019 में जीतना चाहते हैं तो उन्हें सहयोगियों को पूरे सम्मान से साथ बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए. साथ ही उन्हें अलग-अलग राज्यों के और भी दलों को एनडीए के साथ जोड़ना चाहिए.

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क्षेत्रीय मुद्दों पर भी जोर

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के बारे में आम धारणा यह बन गई है कि वह स्थानीय निकायों का चुनाव भी राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ना चाहती है. उधर, विपक्ष ने क्षेत्रीय मुद्दों के साथ प्रयोग करके भाजपा को पटखनी दी है. इसका सबसे नया उदाहरण पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बताए जा रहे हैं. भाजपा ने राम मंदिर जैसे मुद्दे आगे किए और कांग्रेस ने किसानों की परेशानी को मुद्दा बनाकर बाजी मार ली. इसलिए कहा जा रहा है कि भाजपा एक राष्ट्रीय दृष्टि तो रखे लेकिन स्थानीय मुद्दों को भी अपने चुनाव अभियान में तवज्जो दे.

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क्षत्रपों को तवज्जो 

2014 के बाद से भाजपा हर चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ती आई है. इस रणनीति से पार्टी को असाधारण कामयाबी भी मिली है. लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि अब हालात बदल रहे हैं. उधर, 2019 के लिए कांग्रेस जिस तरह से गठबंधन कर रही है, उसमें स्थानीय नेताओं का अपने-अपने राज्यों में खास महत्व होगा. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे तो रखे लेकिन, अपने क्षत्रपों या अपने सहयोगी दलों के क्षत्रपों को भी महत्व दे.

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पिछड़ों पर जोर

उत्तर प्रदेश में जिस तरह का महागठबंधन आकार लेता दिख रहा है, उसमें तय माना जा रहा है कि यह महागठबंधन पिछड़ों की आक्रामक राजनीति करेगा. जानकारों के मुताबिक अगर भाजपा को इसका मुकाबला करना है तो उसे पिछड़ों के साथ खड़ा होना होगा. टिकटों के बंटवारे में उनको वाजिब प्रतिनिधित्व देना होगा. कुछ लोग तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में महागठबंधन से मुकाबला करने के लिए नेतृत्व परिवर्तन यानी मुख्यमंत्री बदलने का सुझाव भी दे रहे हैं. इनका मानना है कि पार्टी को पिछड़े समाज के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना देना चाहिए.

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महागठबंधन में दरार की कोशिश

उत्तर प्रदेश के महागठबंधन के बारे में यह माना जा रहा है कि यह भाजपा और 2019 में उसकी जीत के बीच आकर खड़ा हो गया है. महागठबंधन के घटकों का आरोप है कि भाजपा लगातार उनमें दरार डालने की कोशिश कर रही है. माना जा रहा है कि अगर महागठबंधन पटरी से उतर गया और सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़े तो वोटों के बंटवारे से फिर भाजपा को सबसे अधिक फायदा होगा. ऐसे में अधिकांश जानकारों का यह मानना है कि अगर मोदी-शाह की जोड़ी 2019 लोकसभा चुनावों में जीत को लेकर आश्वस्त होना चाहती है तो उसे महागठबंधन में दरार पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए.

(सत्याग्रह की इस रिपोर्ट पर आधारित)

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