विरोध प्रदर्शन

रिपोर्ट | राजनीति

शरणार्थी गैर-मुस्लिमों के लिए लाए गए नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने के लिए लाए गए नागरिकता (संशोधन) विधेयक का असम सहित पूरे पूर्वोत्तर में विरोध हो रहा है

ब्यूरो | 16 जनवरी 2019 | फोटो: पिक्साबे

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नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 क्या है?

यह विधेयक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिमों के लिए भारत की नागरिकता आसान बनाने के मकसद से लाया गया है. इसके अमल में आने के बाद वे भारत आने पर 12 के बजाय छह साल बाद ही नागरिकता हासिल कर सकते हैं. इसके अलावा अगर असम की बात करें तो 1985 के असम समझौते के मुताबिक 24 मार्च 1971 से पहले राज्य में आए प्रवासी ही भारतीय नागरिकता के पात्र थे. लेकिन नागरिकता (संशोधन) विधेयक में यह तारीख 31 दिसंबर 2014 कर दी गई है. विधेयक को लोकसभा ने मंजूरी दे दी है और अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाना है.

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धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता को लेकर पर भाजपा का क्या तर्क है?

कांग्रेस सहित कई दलों ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया है. उनका कहना है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है. उधर, भाजपा का कहना है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक से असम को मुस्लिम बहुल बनने से बचाया जा सकेगा. असम के वित्त मंत्री और पूर्वोत्तर में भाजपा के मुख्य रणनीतिकार हेमंत बिस्वा शर्मा तो यह तक कह चुके हैं कि अगर यह विधेयक कानून नहीं बना तो असम ‘जिन्ना के रास्ते पर’ चला जाएगा. उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे विभाजन के समय हुई गलतियों का प्रायश्चित बता चुके हैं.

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असम और पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?

असम के मूलनिवासी बाहरी लोगों की पहचान हिंदू-मुस्लिम आधार पर नहीं करते. वे उन हिंदू बंगालियों को भी बाहरी मानते हैं जो बांग्लादेश से वहां आए हैं. असमिया भाषी लोगों का मानना है कि बांग्लाभाषी उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के लिए बड़ा खतरा हैं. पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों की एक बड़ी आबादी भी ऐसा ही मानती है. यही वजह है कि ये सभी नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध कर रहे हैं.

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इस मुद्दे पर बांग्लाभाषी लोगों का क्या रुख है?

असम की बराक घाटी में बांग्लादेश से आए हिंदू प्रवासियों की बड़ी आबादी है. ये लोग नागरिकता (संशोधन) विधेयक के पक्ष में है. उनका मानना है कि इससे उन्हें नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के मामले में भी मदद मिलेगी. इस कवायद के तहत अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाना है. अभी भी असम के 40 लोग इस रजिस्टर से बाहर हैं. उधर, बांग्लाभाषी मुस्लिम आबादी का रुख उलट है. वह इस मुद्दे पर असम गण परिषद जैसे स्थानीय संगठनों के साथ है जो इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं.

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इस असंतोष को शांत करने के लिए केंद्र सरकार और भाजपा क्या कर रहे हैं?

केंद्र सरकार का कहना है कि मूलनिवासियों को इस विधेयक से आशंकित होने की जरूरत नहीं है. उसके मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 371 और असम समझौते की धारा छह के जरिये मूल निवासियों के राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा जा सकता है. इनमें उनके लिए संसद और विधानसभा में सीटें आरक्षित करने जैसे प्रावधान हैं.

(द टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट पर आधारित)

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