हांगकांग प्रदर्शन

रिपोर्ट | विदेश

क्यों हांगकांग में लाखों लोग चीन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं

हांगकांग में लाए जा रहे नए प्रत्यर्पण कानून के विरोध में 20 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए हैं

ब्यूरो | 17 मई 2019 | फोटो : nvcnews.org

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चीन के स्वायत राज्य हांगकांग में नए प्रत्यर्पण कानून के विरोध में हो रहा प्रदर्शन बुधवार को हिंसक हो गया. प्रदर्शनकारियों ने पूरे शहर के साथ ही यहां की विधान परिषद को भी पूरी तरह घेर लिया. इसके बाद पुलिस की कार्रवाई में कई पत्रकार, कारोबारी और मानवाधिकार समर्थक घायल हुए हैं. बुधवार को हुए प्रदर्शन ने दुनिया भर का ध्यान इसलिए भी खींचा क्योंकि करीब दस लाख लोग चीनी सरकार के विरोध में सड़कों पर थे. हालांकि, अब तक एक सप्ताह के अंदर 20 लाख से ज्यादा लोग इन प्रदर्शनों में हिस्सा ले चुके हैं. हांगकांग में इतने बड़े प्रदर्शन को देखते हुए यह सवाल उठता है कि आखिर नए प्रत्यर्पण कानून में ऐसा क्या है जिसके चलते ऐसा हो रहा है.

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हांगकांग के मौजूदा प्रत्यर्पण कानून में दुनिया के कई देशों के साथ कोई समझौता नहीं है. इसके चलते अगर कोई व्यक्ति अपराध कर हांगकांग आ जाता है तो उसे कई देशों में प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता. चीन भी ऐसे देशों में शामिल है. लेकिन, अब हांगकांग की सरकार इस मौजूदा कानून में संशोधन कर रही है. इसके बाद लोगों को चीन और ताइवान भी प्रत्यर्पित किया जा सकेगा.

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इस नए कानून को लेकर हांगकांग के लोगों में कई तरह की चिंताएं हैं. हांगकांग में कानूनविदों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग है जो चीनी सरकार के तानाशाही रवैय्ये का विरोध करता रहता है. माना जाता है कि इसकी वजह से चीनी सरकार अपने मनचाहे आदेश हांगकांग पर नहीं थोप पाती. ऐसे में लोगों को डर है कि नए प्रत्यर्पण कानून के बाद चीन इन लोगों पर अपने मन मुताबिक कानूनी कार्रवाई कर सकता है.

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हांगकांग में प्रत्यर्पण कानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को वहां के सौ से अधिक बड़े कारोबारियों ने भी अपना समर्थन दिया है. हांगकांग को दुनिया का बड़ा कारोबारी हब माना जाता है. ऐसे में इन कारोबारियों को यह डर है कि नए कानून के जरिए चीन उन्हें आर्थिक अपराधों में फंसाकर अपनी अदालतों में उलझा सकता है. और इसका असर हांगकांग की कारोबारी प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है.

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हांगकांग लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था. 1997 में ब्रिटेन ने उसे 50 साल तक स्वायत्तता की शर्त पर चीन को सौंपा था. जानकारों का मानना है कि यह कानून 1997 में हुए उस समझौते के भी खिलाफ है. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने भी सख्त लहजे में कहा है कि उनकी सरकार इस प्रस्तावित संशोधन पर अच्छे से गौर करेगी जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह ब्रिटेन-चीन समझौते का उल्लंघन नहीं है.

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